( १४ ) हिंदी पुस्तकों की खोज हिंदी शब्दसागर आदि अनेक कार्यों के लिये आपने लाखों रुपए इक किए। सन् १८२६ में देखा गया कि सभा का वर्तमान भवन भी उसकी आवश्यकताओं के लिये पर्याप्त नहीं है, तो आपने उद्योग करके राजा महाराजाओं से प्रायः १००००) और संयुक्त प्रदेश की सरकार से २३०००) रुपयों का चंदा प्राप्त किया और उस भवन की दूसरी मंजिल भी तैयार कराई। इसके साथ ही सभा के पीछे की भूमि मी ४०००) रुपए पर ले ली, जिसमें प्राय: एक लाख रुपयों की लागत से एक बड़ा भवन बनवाने का विचार है। एक साथ बहुत से कार्य लेने और उन्हें सफलतापूर्वक निभा लेने की आपमें असाधारण दक्षता है । सरस्वती, नागरी- प्रचारिणां पत्रिका, हिंदी शब्दसागर, प्राचीन हिंदी साहित्य की खोज, कई ग्रंथों का संपादन और प्रकाशन तथा सभा की सर्वांगीण उन्नति – ये सब काम आप एक साथ सफलतापूर्वक करते रहे। सभा के साथ आपका कितना प्रेम है इसका कोई उदाहरण देने की भाव- श्यकता नहीं हैं ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। हम इतना ही कहना पर्याप्त सकते हैं कि यदि ये इस सभा और साथ ही हिंदी की सेवा में न लगकर अपनी ऐहिक उन्नति की ओर ध्यान देते तो हम नहीं कह सकते कि वे कितने ऊँचे पद पर सुशोभित होकर सव प्रकार के सांसारिक सुखों का उपभोग कर सकते । गत तीन वर्षों से पुत्रशोक के कारण आप बहुत ही शिथिल और दुर्बल हो गए है और बीच बीच में कई बार बीमार भी हो चुके हैं। अभी तक आपका शरीर पूर्ण रूप से सँभलने भी नहीं पाया है, तिसपर भी आप निरंतर सभा का कार्य कर रहे हैं। सभा के भविष्य के संबंध में आपके अनेक उच्च विचार और आदर्श हैं। आप सभा में एक अजायबघर स्थापित करना चाहते हैं । आपकी यह भी इच्छा है कि सभा के साथ एक ऐसा भवन बनवाया जाय जिसमें विद्वान लोग सदा रहा करें और वहीं रहकर साहित्यसेवा के बड़े बड़े कार्य किया करें। उनके व्यय निर्वाह
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