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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/३३१

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२८८ करहिया को रायसौ दोहा फते पाय धारा धनी भए इकट्ठे वीर | देश जमाया जुगत से कर मसलत रन धोर ।। ५२ ।। नृपत बड़ाई बहुत किय तुम अर्जुन के रूप । शत्रुन को दाहन दहन धारे पहुमि सरूप ॥ ५३ ॥ रामसिंह सिरोपाव दे कीनो बसौ करहिया नगर में करो हुकुम समाज । निकंटक राज || ५४ ॥ श्याम राव आदर कियौ कीनी कृपा अपार । नगर बसाया जुगति करि सबै देश सम्हार ।। ५५ ।। चार वरण निज धर्म से शोभा लही अपार । सुबस बसाय नगर को करि इकठी परवार ।। ५६ ।। सवैया जौ लगि मेरु महेश दिनेश धनेसुर लो धन धाम भरौ । रवि नीर समीर सुधा सुविनायक पारथ लों अरि वृंद हरी ॥ शशि सुम्रत सक्ति षडानन गंग गुलाब कदै प्रभुता सो करौ । चिरजीज करहिया में धारा-धनी निज धू लगि भूप अनंद करौ ॥ ५७ ॥ दोहा सुख संपति साहस सुयश पुत्र मित्र परिवार | धू लगि करहु अनंद भूप्रति बल प्रबल पमार ॥ ५८ ॥ केहरि सिंह दिवान के भए गजा छितपाल । धर्म कर्म धीरज धवल गेो विप्रन प्रतिपाल ।। ५८ । मकले मुहुकम सिंघ जू तिन ते लघु नवलेश । 1 ता लघु कुमर सुजानि सिंह दारन परिवर देश ॥ ६० ॥ सावंत सावंत सिंघ की राजत श्री रघुनाथ । दान सत्य' सन्मान से छित कीना यश गाथ ।। ६१ ।।