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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/३३४

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(१५) पुराणों के महत्त्व का विवेचन [ लेखक - रायबहादुर श्री पंड्या बैजनाथ बी० ए० ] हिंदू जनता में पुराणों के विषय में दो प्रकार के मत पाए जाते हैं। एक तो अंध-परंपरा के माननेवाले लोग हैं जो पुराधों की सब बातों को अवरशः सत्य मानते हैं । दूसरा शिक्षित विभाग है जो उनके किसी विशेष महत्त्व को नहीं मानता । इन शिक्षित जनों की समझ में पुराण केवल बालकवत् बुद्धिवालों को धार्मिक तत्त्व और धार्मिक किस्से समझाने के लिये रचे गए थे । वास्तव में सत्य इन दोनों मतों से भिन्न है । यदि हम कटाक्ष की दृष्टि से पुराणों पर निष्पक्ष भाव से विचार करें तो हमको पुराणों का बड़ा महत्त्व देख पड़ेगा । इसके लिये यह जानना श्रावश्यक है कि पुराणों का विकास किस प्रकार हुआ है । पुराण शब्द का अर्थ क्या है ? वायुपुराण और पद्मपुराण में लिखा है कि जिसमें पूर्व काल की परंपरा कही हो, वह पुराण है । शुक्रनीति, अमर-कोष तथा पुराणों में पुराण के पाँच लक्षण कहे हैं- सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वंतर और वंशानुचरित्र । ये पाँच बातें प्रत्येक पुराय में होनी चाहिएँ । भारतवर्ष में बहुत प्राचीन काल से भाट लोगों की प्रथा चली आती है । इन लोगों का कार्यक्षेत्र बढ़ते बढ़ते इनके तीन विभाग हो गए। " इनका प्रधान कार्य आरंभ में ये लोग यह राजाओं का कीर्ति-गान करना था । कीर्तिगान अपनी स्मृति के आधार पर ही करते थे । इस प्रकार आख्यान ( स्वयं देखी हुई घटना का वर्णन ), उपाख्यान ( सुनी हुई ), गध्या ( पुराने पितरों के गीत ) और कल्पशुद्धि ( श्राद्ध, कल्पादि के विषय में जिसमें निर्णय होवे ) से इंन पौराणिक