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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/३४४

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रायबहादुर श्री पंड्या बैजनाथ बी० ए० ३०१ विल्सन साहब अपने विष्णु पुराण में लिखते हैं- A very great portion of the contents of many, and some portions of the contents of all, is genuine and old (other portions being later are pious frauds for temporary purposes) अर्थात् बहुत से पुराणों का बहुत विशेष भाग और सब पुरायों कुछ मात्र असल और पुराना है । ( दूसरे भाग पीछे से सामयिक अर्थसाधन के लिये धर्म की दृष्टि से दूसरे लोगों ने जोड़ दिए हैं। ) उनका यह भी कथन है- It is possible however that there may have been an earlier class of Puranas of which those, we now have, are but the putial and ahulterated represent - atives. The identity of the words (for in several of them long passages are literally the same) is a sufficient proof that in all such cases they must have copied from some other similar work or from a com- mon or prior original अर्थात् यह संभव है कि कोई आदि पुराण रहे हों जिनकी असमय और बिगड़ी और मिश्रित की हुई नकलें आजकल के पुराण हो। कई पुराणों में कुछ कुछ अंश अक्षरश: समान हैं। इस प्रमाण से सिद्ध होता है कि इन सब ने किसी ऐसे ही पूर्व ग्रंथ से या एक असल पूर्व ग्रंथ से नकल की हो । विष्णु, मत्स्य, ब्रह्मांड और पद्म की सृष्टि प्रक्रिया पढ़ने से जान पड़ेगा कि इन सब में एक ही कथा, एक ही विषय है और विशेष भागों में श्लोक श्लोक का मेल खाता है। किसी पुराण में दो चार श्लोक अधिक हैं, किसी में कम । इस प्रकार के सादृश्य से विल्सन साहब का उपयुक्त अनुमान सत्य जान पड़ता है । विसेंट स्मिथ साहब अपने पूर्व के लेखकों का दोष इस प्रकार निकालते हैं- Modern European writers have been inclined to