सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/३४६

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

रायबहादुर श्री पंढ्या बैजनाथ बी० ए० (७) भागवत में एक पंक्ति पाली भाषा की आ गई है- मागध राजानो भवितारो वदामि ते ।” २०३ 'अथ - ये दोष मत्स्य, वायु ब्रह्मांड पुराणों में और विष्णु और भागवत पुराणों के विभागों में पाए जाते हैं। मत्स्य, वायु और विष्णु पुराणों में जो नकल करने की अशुद्धियाँ घुस गई हैं, उनसे जान पड़ता हैं कि उस समय पुराण खरोष्ट्री लिपि में लिखे हुए थे । इन साहब का मत है कि ऐतिहासिक परंपरा या अनुश्रुति की सत्य मानना चाहिए, जब तक कि इसका विरोधी इसे असत्य साबित न कर दे। इनके अनुसार ब्राह्मण और क्षत्रिय अनुश्रुतियों का प्रवाह दो समान धाराओं में चला आता था ! ये महाशय प्रथम संस्करणों को विशेष प्रमाण योग्य मानते हैं; क्योंकि ब्राह्मणों का जितना अधिक हस्तक्षेप हुआ, उतनी ही अप्रामाणिकता बढ़ती गई जैसे ब्राह्मणों ने श्रुतियों में क्षेपक नहीं डाला, वैसे ही सुत लोगों ने पुराणों की नहीं बदला। इन महाराय ने पुराणों और महाभारत की सहायता से भारत के सारे राज्यों की समकालीन सूची बनाई है जो विशेष महत्व की है। यह } यूरोपीय विद्वानों ने पुरायों का विचार केवल ऐतिहासिक दृष्टि से और पौराणिक कथाओं के विकास की दृष्टि से किया है । विचार पुराणों के एक भाग पर ही हुआ । परंतु वास्तव में पुराणों में कई प्रकार के सत्य भरे हुए हैं। इनके कुछ उदाहरण देखने से यह बात स्पष्ट हो जायगी ! किसी किसी कथा से आर्य जाति के सामाजिक विकास पर प्रकाश पड़ता है; जैसे दीर्घतमस और उनके पीछे श्वेतकेतु ने ब्राह्मण स्त्रियों के लिये एक काल में एक पति का और जीवित पति को त्यागकर दूसरे पति को न ग्रहण कर सकने का नियम चलाया । महाभारत में एक जगह प्रगस्त्य और नहुष का संवाद है | अगस्त्य नहुष से पूछते हैं कि तुम वैदिक मंत्रों को मानते हो जिनके द्वारा वृषभ बलिदान होता है ? नहुष ने कहा, नहीं। ऋषि ने कहा,