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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/३५५

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३१२ पुराणों के महत्व का विवेचन सूची भवभूति के पूर्व की जान पड़ती है। इसलिये रामाश्रमेध पर्व या पातालखंड भी भवभूति के बहुत पूर्व का होना चाहिए । ३ विष्णुपुराण - मत्स्यपुराण में इसे २३,००० लोक का ग्रंथ कहा है। इसके अनुसार वाराह कल्प का वृत्तांत आरंभ कर पराशर ने इसमें सब धर्मकथा प्रकाशित की है । नारदपुराण के वन से जान पड़ता है कि इसमें दो भाग थे; आदि भाग में ६ अंश थे और उत्तर भाग का नाम विष्णु धर्मोत्तर कहा है । दोनों को मिलाकर २३,००० श्लोक का कहा है । प्रचलित विष्णुपुरा में प्रथम भाग के छः अंश और लगभग ७,००० श्लोक हैं । विल्सन साहब ने इस पुराण की सात नकलें भारत के जुदा जुदा भागों से मँगवाई थीं, पर उन सबमें इतनी ही लोकसंख्या थी । आजकल विष्णुपुराण या विष्णुधर्मोत्तर दो जुदा जुदा ग्रंथ समझे जाते हैं; परंतु नारदपुराण की सूची के समय ये दोनों एक ही ग्रंथ के भाग थे । शंकराचार्य के समय में ६ अंश का विष्णुपुराया था, क्योंकि विष्णुसहस्रनाम के भाष्य में एक जगह उन्होंने " यस्मिन्न्यस्तमतिः " श्लोक को विष्णुपुराण के अंत में कहा है । यह श्लोक ad अंश के आठवें अध्याय में ५५ वाँ है । उन्होंने विष्णुधर्मोत्तर से भी श्लोक उद्धृत किए हैं और उसे स्वतंत्र ग्रंथ माना है । इसलिये नारदपुराण की सूची शंकराचार्य के पूर्व की है, ऐसा बोध होता है। विष्णुधर्मोत्तर या विष्णुपुराण दोनों को मिलाने से श्लोकसंख्या १६,००० होती है। ऐसा जान पड़ता है कि विष्णुधर्मोत्तर पर लोगों की विशेष श्रद्धा न रहने से उसके ७.००० श्लोक खो गए । ब्रह्मगुप्त ने अपनी ज्योतिषपद्धति सन ई० ६२८ में विष्णुधर्मोत्तर पुराण से ली थी । नारदपुराण के अनुसार भी इसमें ज्योतिष का अंश था; पर वह अब लुप्त हो गया । अष्टादशपुराणदर्पणकार का मत है कि काशमीर में प्रचलित विष्णु- धर्मोत्तर में ज्योतिष अंश अब भी है । नारदपुराण की सूची में भविष्य राज्यवंश का स्पष्ट वर्णन नहीं है । पुराण में गुप्त और तत्सामयिक S