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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/३५६

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रायबहादुर श्री पंड्या बैजनाथ बी० ए० ३१३ राजाओं का वर्णन रहने से इस आधुनिक पुराय को छठी शताब्दी

  • पहले की रचना नहीं कह सकते ।

हेमादि ने और स्मृतिश्नावलीकार ने वृहद् विष्णुपुराण से श्लोक उद्धृत किए हैं, किंतु यह पुराण अब नहीं मिलता । ४ वायु अथवा शैवपुराण – कोई इन दोनों को एक पुराय बताते हैं और कोई कोई इनको भिन्न भिन्न पुराय कहते हैं कुछ पुराणों ने इसे शैव कहा है और कुछ ने वायु । एक मुगल- पुराणकार ने दोनों नाम कहे | वायुपुराण के रेवामाहात्म्य में लिखा है-- į यथा शिवस्तथा शैवं पुराणं वायुनोदितम् । शिवभक्तिसमायोगान्नामयविभूषितम् ।। } शिवपुराण वायु ने कहा इसलिये इसके दोनों नाम पड़े। रेवा- माहात्म्य के आरंभ में भी ऐसा ही कथन है और इसके चार पर्व कहे हैं। नारदपुराण की सूची के अनुसार इस पुराण के पूर्व भाग में गयामाहात्म्य होना चाहिए । आजकल गयामाहात्म्य और रेवा- माहात्म्य स्वतंत्र मिलते हैं। इन दोनों के सहित चार पर्व का वायु- पुराण कहीं नहीं मिलता । कलकत्त के एशियाटिक सोसायटी के छपे वायुपुराण में न तो गयामाहात्म्य है और न चार पर्व उसमें और भी त्रुटियाँ हैं। बंबई के शिवपुराण में पूर्वोत्तर भाग या चार पर्व नहीं मिलते इस शिवपुराण के वायुसंहिता भाग में इसे एक लक्ष का कहा है; पर शैव उर्फ वायु को कहीं २४,००० से अधिक का नहीं कहा है। इसलिये बंबईवाला एक लक्ष का ग्रंथ दूसरा है । कदा- चित् वह कोई उपपुराण हो । उस ग्रंथ की आधुनिक सूची वायु- संहिता में दी हुई सूची से नहीं मिलती और उसमें एक लक्ष के बदले २४,००० श्लोक और १२ संहिताओं के बदले ७ संहिताएँ हैं: यह एक स्वतंत्र शिवपुराण है। वेंकटेश्वर प्रेस का छपा वायुपुराण नारदोक्त वायु का पूर्व भाग मालुम पड़ता है । प्रानंद श्राश्रमवाला भी ऐसा पूर्वार्द्ध समझा जा सकता है ४० i