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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/३७३

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३३० बिहारी सतसई की प्रतापचंद्रिका टीका सावीयर देसीलवा तिनके सुत प्रगटेसु ।। अरबी और फिरंग में और फारसी देसु ॥ ४५ ॥ ज्योतिष न्यायरु व्याकरन साहित काव्य प्रकास । अंग सहित ताका सबै विलसत बुद्धि विलास ॥ ४६ ॥ महाराज कुरम कलस श्रीपरताप नरेस | जिनके है सुहकीम तो विदित सबन ही देस ।। ४७ ।। महाराज की चंद्रिका लषिकै बहु बिस्तार | अलप बुद्धि साहित्य में तिनको यह उपगार ॥ ४८ ॥ ॥ अब ऐसे यह कीजिए लच जु दोहा देषि । जे लक्षन जानत सु वे क्यों बाँचें यह लेषि ।। ४४ ।। मनीराम लहिकै हुकम की लघु बिस्तार | जे प्रवीन साहित्य में तिनको है सुषसार ।। ५० ।। इति श्रीमहाराजाधिराज महाराजा श्रीसवाई प्रतापसिंघ चंद्रि- काय राजवंस कविवंस वर्ननं नाम प्रथम प्रकासः ।। १ ।। ध्वनि ॥ अथ विहारी कृत सतसई टीका लिप्यते दोहा मेरी भत्र बाधा हरी राधा नागरि सोय । जा तन की झाँई पर स्याम हरित दुति होय ॥ १ ॥ कारज और रंग । टीका - आसीर्वादात्मक मंगलाचरन है । यामैं देवरति भाव विषमालंकार श्लेषाभाव है || कारन को रंग और ही यह विषमालंकार को विर्यो भेद छबि संग || अमर || प्रथम मंगलाचरन यह कवि की बिनती जानि । प्रगटत अपनी अधमता अधिकाई धुनि आनि । जितै। प्रथम तितनी बड़ी भवबाधा यह अर्थ । उहि हरिबे को चाहिए कोऊ बड़ो समर्थ ॥ नर बाधा की सुर हरत सुर बाधा ब्रह्मादि । ब्रह्मादिक को बाध की हरत जु स्वाम अनादि • ॥ लषि राधा तिन स्याम की बाधा हरति न कोय ।