पुरोहित श्री हरिनारायण शर्मा बी० ए० ३३१ यातै मा बाधा हरौ राधा नागरि सोय || जिनके इक छिन बिरह मैं स्याम बिकल बिलषात । पुनि तिन तन काँई पर होत उहहो गात || बाधा त्रिभुवननाथ की 'हरन जोग जे आहि । तेई मोसे अधम की बाधा हरौ निवाहि || इहिं विधि सरबोपर परम कर्म । यातें इनहीं की घरी प्रथम मंगलाचर्न || इष्ट जानि सुष अलंकार इहिं अर्थ में काव्यलिंग है जानि । अब ताकौ लच्छन सुनौं ग्रंथन गत चित आनि ॥ काव्यलिंग सामर्थता जह दृढ करत प्रवीन 1 ह्याँ भवबाधा हरन की द्रढ समर्थता कीन - द्वितीय अर्थ - मेरी भव बाधा हरौ राधा नागरि सोय । कैसी है तिनकै सुनौ इमि बखान कवि लोय || जा तन की कोई परें नैक ध्यान मैं आय। दूरि होय स्यामत्व तम दुति जु सत्व अधिकाय ॥ इहाँ हू सामर्थता द्रव्य दिपाई यातै काव्यलिंग है। - तृतीय प्रर्थ-वे राधा बाधा हरौ पीत रंग उद्योत । जिनकी वन झाँई पर स्याम हरित रंग दांत || यहाँ हेत अलंकार है ताकी लक्षण । हेत सहित कारज जहाँ कई देत कविराज । प्रिया पीत रँग स्याम पिय हेतु हरिति रँग काज ॥ राधानागर यौं पाठ होय तौ श्रीकृष्णपक्ष अर्थ-वे मेरी बाधा हरौ राधानागर सोय जिनके सुमिरत नैक ही इतौ महाफल होय || जिन तन की झाँई परे स्याम ध्यान में आइ । हरि के तद्युत होय वह सारूपहि की पाय । इहां तद्गुणालंकार लक्षण ं । तद्गुन निज. गुन तजि जहाँ और गुन लपटाय । हरि भाई ते हरि भयो अपनी रूप नसाय | औरहु अर्थ अनेक बिधि करन मंगलाचर्न। कहे न भय विस्तार के सुनहु सुकवि सुपकर्न || रति भाव-ध्वनि लिपी ताकी यह भेद | को अथवा राजा को मुनि की इत्यादिक के वर्तन होय सेो भावध्वनि कहिए यह भेद | और श्लेष भास लिया है सो आभास वाक कहिए। दीसै मरु होय नहीं । सो यहाँ भव शब्द में श्लेषाभास 1 भव के अर्थ बहुत हैं । भव संकर संसार भव, भव कहिए कल्यान । भव जु जनम, जब सफल तब भजि लोजे भगवान || श्रीगताप - अनवर ने देव- जो कवि की प्रतीति देवता
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