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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/३७६

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पुरोहित श्री हरिनारायण शर्मा बी० ए० २२३ मैं भेद न लहै, जिहि थल कविजन मीलति कहें । मीलतिसम इनको एक बाचकानुप्रवेस संकर । तुल्ययोगिता की संसृष्टि ॥ अमर-प गर्विता के वचन सांभा केहि माहि । कहि एहो के अंग तो अंग सुहागिल ठाहिं ! मीलति अलंकार || श्रीप्रताप-तन भूपन तुल्य योगिता । सम । क्रमही सैौ । लक्षण | अलंकार - रत्नाकरे - होय अवक व की एक धर्म समान । नहि सोभा की साजियन धर्म कि समता ( मान ) | अलंकार सम तीन विधि जथा जाग की संग ! तन भूपन इत्यादि से जथाजोग की संग ॥ ३॥ दाहा पचरंग रंग वेदी परी उठी ऊगि मुप जाति : पहरे और चिनोठिया चटक चीनी ति ॥ ४ ॥ टीका--जो सभी की उक्ति हाय तौ नायक सी कृषि उपजायत है । जो नायक की उक्ति होय तो गुनकथन । स्वभावोक्ति अलं- काम : ( लक्षण ) जैसी जाकी रूप रंग पूर्वोक्तं ! वरती तैसा साज | अमर प्रश्न-पचरंग कोमलावृति | 'वैचित्त' इति रंग पुनि शब्दवदि इक यह प्रश्न सुजानि । दुजे चौगुनि चटक मिलि प्रश्न सुतीनि प्रमानि !! ( परी चटक ग्राम चौगुनी प्रश्न सुतीनि प्रमानि ) । उत्तर - केह तिय पियसां रेंग भयो साज्यों सरस सिंगार । वहाँ सषि सौं सषि की बचन कहत सु इहि परकार ।। इक मुप दुतिदुर्जे परी भई रंग पिय पाय । तीजे बैदा चोर लहि चटक चौगुनी गाय ॥ इहाँ अनगुन अलंकार है । लक्षण ! अनगुन जब संगति भयै पूरव गुन सरसाय । एक चटक सौं चौगुनी भई रंग पिय पाय ! प्रताप - वृत्त्यानुप्रास | भाषाभूषत । प्रति अक्षर आवृत्ति बहु वृत्ति तीनि विधि मानि । नागरिका मानि ॥ उदाहरन रसरहस्ये । मधुर वृत्ति जामै सबै उप- चंद सौ भानन चाह सौं चूमें चलें चप चारु न चाँप चपाई । यामै चकार को बहुवर वृत्ति श्रई। रँग रँगलाटा । लः भाषाभूषणे। सो लाटानुग्रास जे | 4 पद की प्रावृति होय । सब्द अर्थ के भेद बिनु भिन्न भाव कछु होय !