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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/३८५

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३४२ बिहारी सतसई की प्रतापचंद्रिका टीका नूतन भूषन सौं कहीं तिनकी मतन विचारि । मनीराम विनती करै भूल्यो लेहु सुधारि ।। १२ ।। इति श्रीमन्महाराजाधिराज महाराजा श्री सवाई प्रतापसिंह चंद्रिकायां प्रस्ताविक अन्योक्ति वर्नन षोडसी प्रकास || १६ || h पुस्तक संपूर्णम् । श्रीरस्तु कल्याणमस्तु | ibe “श्री प्रतापचंद्रिका" पर नोट यह हस्तलिखित ग्रंथ विहारी सतसई की पद्यात्मक सम्पूर्ण टीका । इसके अंदर दोहों का क्रम " अनवरचंद्रिका" के अनुसार सोलह प्रकाशों में इस प्रकार है- संख्या- प्रकाशनाम " छंद १ "राजवंशवनंन' 'साधारण नायका वर्नन" । "सिखनख वर्नन" । 1 ४ 'मुग्वादि नायका वर्तन" । ५ "स्वाधीनपतिका अष्टनायका" । ६ "रूपगर्वितादि नायका" | ७ " माननी नायका" । ८ "सुरति सुरतांत नायका" । € "परकीया नायका" । १० " ददसा वर्णन" । ११ "सात्विक भाव वर्नन" । १२ " मद्यपान वर्तन" । १३ " हा वर्नन" | } दोहा सोरठा" सख्या विशेष ५० कवित्त दोहे ३५ दोहे की टीका €€ "" २१ 37 ११५ " ४ इस प्रकास मं राजवंश- कविवंश- टीका का उपोद्घात- मनीराम कवि ने महाराज के हुक्म से बनाई है जिसका वर्णन इत्यादि । टीका तो दूसरे प्रकासमे हैं । ४६ 39 २८ 33 १४३ 27 १४ 33 १० ७ " ११ " श्रृंगार वीर करुणादि । 99 १४ " श्रृंगारादि नवरस तथा भाव ८२ वर्नन" । १५ " षटऋतु वर्तन" । " वसंतादिक ४३ १६ " प्रस्ताविक - अन्योक्ति को ७५ . प्रस्ताविक नीति-अन्योक्ति वनंन" ।