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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/३८७

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३४४ बिहारी सतसई की प्रतापचंद्रिका टीका 4 - इस एक टीका से अन्य दो प्रतिप्रसिद्ध और सारभरी टीकाभ्रे "अनवरचंद्रिका" और " अमरचंद्रिका" के दर्शन भी हो जाते हैं। और उभय कविता-सार- पारंगत विद्वानों की योग्यता का परिचय उत्तमता से हो जाता है । महाराज श्री प्रतापसिंहजी के साहित्य- मर्मज्ञ कविताप्रेमी और कवि समादरकारी तथा विद्याप्रचारकारी होने का एक उज्ज्वल प्रमाण इस ग्रंथ के निर्माण कराने से ज्ञात हो जाता है । उनके समय में, उनके प्रताप से, सैकड़ों ग्रंथ बने हैं, ऐसा हमको प्रतिभावित हो गया है, जिसकी चर्चा समय समय पर यथासंभव इसी प्रकार की जायगी । और स्वयं मद्दा- राज एक प्रसिद्ध आशु कवि साहित्य पारगामी कला-विशारद भगव- द्भक्त विद्वान थे। फिर उनके पास कवि और गुणिजनों का संघ- दन तो उचित ही था । उनकी "कविवाईसी” जैसी एक रत्नावली प्रख्यात है, ऐसे ही उनकी ' ग्रंथ बाईसी " प्रकीर्तित है । फिर उनकी परख से इस टोका में दो नाभी टीकाकारों के उद्धरण वा हवाले के साथ अपने यहाँ के नामी कवि द्वारा परिशिष्ट टीका को देकर यह " प्रतापचंद्रिका" विहारी के काव्य के गौरव को स्पष्ट दिखाने में चंद्रिका ही मानौं है, और उसका प्रकाश अन्य दो चंद्रिकाओं से और भी बढ़ गया है। दोहों की संख्या ७२३ होती है, जैसा कि ऊपर कहा है । अंत में अनवर का अभिप्राय 1 लिखकर मनिराम कवि ने अपना अभिप्राय लिखा है । महाराज की सभा के अन्य कवियों की सम्मति भी ली है जैसा कि "तिन सिच्छा पाई" से प्रगट होता है । तथा रसरहस्य ( कुलपति मिश्र का ), कविप्रिया ( केशवदास की ) भाषा-भूपन ( म० जस- " चेतसिंहजी का ), अलंकार - रत्नाकर ( कवि दलपति राय वंशीधर का ), कवित्त- रत्नाकर ( सेनापति का ), कविकंठाभरण ( कवि दूलह का ), और " इत्यादि" शब्द से हरिकवि की टीका भाषा- भूषण के ऊपर, आदि ग्रंथ तथा जिनके नाम तो दिए नहीं पर अभिप्राय लेकर लिख दिया है ।