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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/३८९

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३४६ बिहारी सतसई की प्रतापचंद्रिका टीका इस टीका ( प्रतापचंद्रिका ) का उल्लेख "नागरीप्रचारिणी पत्रिका" भाग ८ अंक ३ के पृ० १३७ - १४१ पर हुआ है । परंतु वह व वर अपूर्ण है । कवि ने टीका-निर्माण का संवत् १८४२ स्पष्ट लिख दिया है; अष्टादस ब्यालीस (१८४२) भनि संवत् माधव मास । सुकल पच्छ गुरु पंचमी, किय चंद्रिका प्रकास ||३४|| और कुछ कुछ अपना परिचय भी दिया है । इसके १५ प्रकरणे के जोड़ से ७२३ दोहे होते हैं। प्रथम प्रकाश में ( अनवरचंद्रिका की नकल पर ) राजवंश, कविवंश, ग्रंथप्रशंसा, संवत् आदि भी दिए हैं । फिर १५ प्रकाशों में प्रकरणबद्ध क्रम अनवरचंद्रिका का लिया है। यह कवि मनीराम तंवर (तोमर) राजपूतों का पुरोहित या गुरुं या आश्रित होगा । महाराज प्रतापसिंहजी जयपुरवालों का यह कवि कुछ मनभावना और उनके प्रसिद्ध हकीम और मुसाहिब पुर्तगाली विद्वान मारटीन डी सेलवा ( Desala ) का कृपापात्र प्रतीत होता है। अनंगपाल तँवर से जब दिल्ली छुटी तब उसने फिरता फिरता पाटन (राज्य जयपुर इलाका निजामत तौरावाटो हाल ) में आकर राज्य किया था। तभी से यह इलाका "तँवरापाटी" कहाया, जो अब राज्य जयपुर में है। महाराज प्रतापसिंहजी के एक महाराणी तँवरजी भी थी जो संपतसिंह वर पाठवाले की बेटी थीं। इनका विवाह संवत १८४४ में पाटण ही में हुआ था । संभव है कि यह कवि पाटण से आया हुआ हो । परंतु यह विवाह, टीका के बन जाने से दश वर्ष पीछे हुआ है । टीका के प्रथम प्रकाश के छंद १८ (दोहे) में मनीराम ने " इंद्रगिरि" लिखा है। यह स्यात् इंद्रगढ़" हो, जो जयपुर के अधिकार में रहा है और अब तक इंद्रगढ़ का मामला (कर) राज्य जयपुर में आ रहा है। इंद्रगढ़ के राठौर राजा राजसिंह के भाई अदसिंह की बेटी राठोड़जी महाराजा माधोसिंहजी (जय सिंह सवाई के पुत्र) की ब्याही थीं, अर्थात् यह राठोड़जी प्रतापसिंहजी की