३५२ आचार्य कवि केशवदास उठाया । केशन का समय संस्कृत साहित्य शास्त्र के इतिहास का वह युग है जिसमें संकलन और संश्लेषय का क्रम जोरों पर था । प्राचीन रसमार्ग आलंकारिकों और रीतिमार्गियों के प्रचंड भ्रात्र- मयों को सहकर भी मम्मट आदि नवीन रमार्गियों के प्रयत्न से अपने उचित स्थान पर प्रतिष्ठित हो गया था । ध्वनिमार्ग आगे चलकर उसकी प्रतिद्वंद्विता में खड़ा हुआ था पर वह भी उसका पोषक बन बैठा था । यद्यपि रस के वास्तविक स्वरूप के विषय में अप्पय दीक्षित और पंडितराज जगन्नाथ के वाद-विवाद के लिये अभी स्थान था पर फिर भी शास्त्रकारों ने यह निश्चित कर लिया था कि काव्य में सारभूत अंतरंग वस्तु रस है और अलंकार रीति और ध्वनि अपनी शक्ति के अनुसार उसके सहायक हैं, विरोधी नहीं, और न्यूनाधिक रूप से सभी का काव्य से स्थायी संबंध है । अतएव साहित्य-शास्त्रकार व विरोधी मतों से बहुत कुछ विरोधी अंश निकालकर साहित्य-शास्त्र के भिन्न भिन्न अंगों के सामंजस्य से एक पूर्ण पद्धति बना रहे थे । विश्वनाथ का साहित्य-दर्पण और उसके समान अन्य ग्रंथ इसी प्रयत्न के फस्त थे। वैसे तो कवित्व शक्ति ईश्वरीय देन है; कहा भी है कि कवि जन्म से होता है बनाने से नहीं, पर साहित्य शास्त्र के नियम बन जाने पर उन लोगों को भी कवि बनने का चस्का लगने लगा जो सहज कवि न थे। ऐसे लोगों की आवश्यकता की पूर्ति के लिये आचार्यों ने विषयों का भी वशी- करण कर दिया । कवि को किन किन विषयों पर कविता करनी चाहिए किन पर नहीं, उसे क्या क्या प्रनुभव होने चाहिएँ आदि बातें उनके अभ्यास के लिये लिखी गई । इस प्रकार कवि शिक्षा पर लिखा जाने लगा । केशव इन्हीं पिछले ढंग के आचार्यों में हैं। संस्कृत से चली आती हुई इसी परंपरा को उन्होंने हिंदी में जारी रखा। केशवदास ने कवि-शिक्षा का विषय कोट काँगड़ा के राजा माणिक्यचंद्र के आश्रय में रहनेवाले केशव मिश्र के अलंकारशेखर नामक ग्रंथ के वर्णक रत्न (अध्याय ) से लिया है । अलंकार-
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