३७० साहित्यिक व्रजभाषा तथा उसके व्याकरण की सामग्रो उक्त स्वाभाविक सिद्धांतों के अनुसार उत्तरीय भारत में बोलियों के तीन प्रादेशिक समूह हो गए थे शौरसेनी, मागधी तथा पैशाची, जो अपने अपने क्षेत्रों में बोले जाते और प्राकृत कहलाते थे। शौरसेनी तथा मागधी बोलियों के प्रचार-क्षेत्र के विषय में तो विशेष मत-भेद नहीं हैं, पर पैशाची के क्षेत्र के विषय में अभी विद्वानों के भिन्न भिन्न मत हैं। स्थूल रूप से शौरसेनी बोलियों के प्रचार क्षेत्र की पूर्वी सीमा प्रयाग के आसपास तक, पश्चिमी सीमा दिल्ली के ग्रास- पास तक, उत्तरी सीमा हिमालय की तराई तक तथा दक्षिणी सीमा मध्य प्रदेश के एक बड़े भाग तक कही जा सकती है । पर यह स्मरण रखना चाहिए कि उक्त क्षेत्र की पूर्वी तथा पश्चिमी सीमा- रेखाएँ प्रयाग तथा दिल्ली से ठीक उत्तर-दक्षिण नहीं जातीं, प्रत्युत प्रयाग तथा दिल्ली से दक्षिण जाने में वे पश्चिम की ओर और दिल्ली से उत्तर जाने में कुछ पूर्व की ओर झुकती हुई जाती हैं । शौरसेनी क्षेत्र के पूर्व मागधी का क्षेत्र समझना चाहिए । बोलियों के क्षेत्र के विषय में यद्यपि अभी एकमत नहीं है. तथापि पैशाची भाषा के रूप से जो व्याकरणों द्वारा लक्षित होता है, और कई कारणों से उसका क्षेत्र शौरसेनी क्षेत्र के पश्चिम तथा पश्चिमोत्तर मानना समीचीन प्रतीत होता है । इसी पैशाचो तथा जो यतीने क्षेत्र स्वयं भी ऐसे विस्तृत थे कि इनके भी भिन्न भिन्न प्रांतों की बोलियाँ एक ही सी न रह सकी । उनमें भी पारस्परिक कुछ प्रभेद पड़ गए, यद्यपि उनमें वे मुख्य अवच्छेदक बने रहे, उनको अन्य क्षेत्र की बालियों से अलग करते थे । अब प्रत्येक क्षेत्र में इस बात की आवश्यकता पड़ी कि उसके सब प्रांत के निवासी आपस में सुगमता-पूर्वक वाग्व्यवहार कर तथा चिट्ठी-पत्री लिख सकें। इसके अतिरिक्त लिखे पढ़े लोगों के हृदय में यह अभि- लाषा भी उगने लगी कि उनकी कविता इत्यादि का प्रचार दूर तक हो । इन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति के निमित्त लोग कुछ ऐसी भाषा लिखने पढ़ने लगे, जो यथासंभव अनेक प्रांतों के लोगों की
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