३७८८ साहित्यिक ब्रजभाषा तथा उसके व्याकरण की सामग्री में पंजाatra की कभी कहीं कहीं प्रा गई है। नीचे लिखे हुए बंद से पड़भाषा में छओ प्रकारों की भाषाओं का मेल तथा कारकों एवं क्रियायों का शौरसेनी ढंग होना लचित होता है- कवित्त अति क्यों न उधार सलिल जिमि सिष्णि सिवालह । बरन बरन सोभंत हार च रंग विसालह || बिमल अमल बानी बिसाल (वयन ) बानी वर बन्नन ! उक्तिन बयन विनोद मोद श्रोतन मन हर्नन || युक्त प्रयुक्त जुक्ति बिच्चार बिधि बयन छंद छुत्रो न कह । घटि टि मत्ति कोई पढ़इ (ती) चंद दोस दिज्जैौ न वह || १ |३८|| महाराष्ट्री प्राकृत से लेकर राष्ट्रीय अपभ्रंश तक जो परिवर्तन शनैः शनैः हुए, वे भाषा-परिवर्तन के केवल सामान्य नियम संबंधो वर्णों तथा स्वरों इत्यादि के विपर्यय, आगम, लोप इत्यादि थे। पर षडभाषा में इतना ही परिवर्तन न होकर एक और भी बड़े महत्व का परिवर्तन हुआ, जिसने उसको एक भिन्न ही अवस्था की भाषा बना दिया। इस अवस्था भेद के समझने के लिये हिंदी पाठकों को श्री. युत बाबू श्यामसुंदरदास जी बी० ए० के भाषा विज्ञानः नामक ग्रंथ का तृतीय प्रकरण देखना चाहिए। यहाँ उनका कुछ संक्षिप्त वर्णन पाठकों के सुवीते के लिये किया जाता है । धातुओं के समूह से उन्नति करके जब भाषा बनने लगती है, तब उसकी कई अवस्थाएं होती हैं । उसकी आवावस्था विच्छेदावस्था कहलाती है। इसमें भिन्न भिन्न कारकों तथा लकारों इत्यादि के भाव जताने के लिये मुख्य शब्दों में, उनके सहायक रूप से, अन्य शब्द ज्यों के त्यों जोड़ दिए जाते हैं, जैसे 'घर' शब्द के अधिकरणा कारक का भाव प्रकट करने के निमित्त उसमें मध्य शब्द को जोड़- कर 'घरमध्य' संयुक्त शब्द से 'घर में' का अर्थ समझना । अवस्था में मुख्य शब्द तथा उसके सहायक, दोनों ज्यों के त्यों अपने अपने रूपों में बने रहते हैं; केवल उनके पूर्वापर स्थानों के भेद से इस
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