श्री जगन्नाथदास रत्नाकर, बी० ए० , ३८१ } इस पूरे ही पूरे शब्द जोड़ते हैं, जिससे उनकी भाषा सम्मिश्रावस्था तथा विकृतावस्था, अथवा सम्मिश्रद्यावस्था तथा संयोगावस्था की मिश्रितावस्था की भाषा क्रमशः न होकर, एक ही छलाँग में सम्मि- श्रावस्था तथा विच्छेदावस्था की मिश्रितावस्था की होने लगती है । इस प्रकार जब सम्मिश्रणावस्था में विच्छेदावस्था मिलने लगती है. तो क्रमशः उसका मेल अधिक होता जाता है, और वह विच्छेदा- वस्था का भाग शनैः शनैः संयोगावस्था की ओर, और फिर सम्मि- श्रावस्था की ओर बढ़ने लगता है, जिसका परिणाम यह होता है कि एक नई ही सम्मिश्रणावस्था की भाषा बन जाती है, क्योंकि जिस सम्मिश्रणावस्था की भाषा से अलग होकर यह नई सम्मिश्रणावस्था की भाषा बनती है, उसी के तुल्य इसका रूप नहीं होता । भिन्नता का यह कारण होता है कि इन दोनों भाषाओं की आदि अवस्था में जोड़े जानेवाले शब्द प्राय: एक ही नहीं होते और न उनके शनैः शनैः विकृत होने के कारण क्रम तथा रूप ही एक होते हैं। पर फिर भी इन दोनों भाषाओं के मुख्य शब्दों में कुछ साम्य बना रहता है, जिससे एक भाषा के अनेक शब्दों की धातुएँ, अन्य भाषा के उन अर्थों के शब्दों की धातुओं से ज्यों की त्यों अथवा कुछ वर्षों के हेर फेर से मिलती हैं। i पर जो भाषा किसी मूल भाषा से इस प्रकार सीधी नहीं निकलती, उसकी धातुओं के रूप मूल भाषा की धातुओं से उतने नहीं मिलते। फिर मूल भाषा से इस प्रकार सीधी निकली हुई कई भाषाओं की धातुओं के रूप में भी परस्पर उतना साम्य नहीं होता । इस प्रकार अनेक भाषाओं में साम्य के न्यूनाधिक्य का परिमाण भिन्न हो जाता है । यह विषय भाषा विज्ञान का है, हमारे वर्णनीय विषय से इसका विशेष संबंध नहीं; केवल प्रसंगवशात् इतना लिख दिया गया ! जिस समय शाकल्य, शाकटायन इत्यादि व्याकरणियों और अंत- तोगत्वा पाणिनिजी के परिश्रम से संस्कृत भाषा परिमार्जित होकर शनैः शनैः अपनी चरमावस्था को पहुँचो, और साहित्यिक भाषा के
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