श्री. जगन्नाथदास रत्नाकर, बी० ए० ३८५ है। जिस प्रकार महाराष्ट्री प्राकृत तथा राष्ट्रीय अपभ्रंश, शौरसेनी ढंग की होने पर भी, राष्ट्रीय साहित्यिक भाषा मानी जाती थी, उसी प्रकार तथा उन्हीं कारणों से पभाषा भी साहित्यिक भाषा हो गई । इसका आधिपत्य यद्यपि उतना विस्तृत तो नहीं हुआ, तथापि मगध तथा पंजाब प्रदेशों के एक बड़े भाग तक इसका प्रचार अवश्य था, और दूर दूर के लोगों की कविता में भी वह अपना प्रभाव कुछ न कुछ झलका देती थी, जैसे श्रीयुत विद्यापति ठाकुर तथा श्री गुरु नानकजी के पदों में । इसके इतनी व्याप्त भाषा हो जाने पर भी इसका कोई व्याकरण इत्यादि नहीं बना । अतः परम स्वतंत्र होने के कारण इसने बहुत शीघ्र शीघ्र रूप बदलना आरंभ किया । जो लोग अपनी रचना कुछ बँधी हुई रीति पर करना चाहते थे, वे तो प्राकृत तथा अपभ्रंश का सहारा लेते थे, जैसा कि ऊपर उद्धृत दोनों छंदों से प्रकट है; पर जो लोग अपनी रचना के प्रचाराधिक्य तथा लोकप्रियता के अभिलापी थे, वे पद्माषा ही के किसी रूप में अपने मंथ बनाते थे । ऐसे रचयिता जिस प्रांत के निवासी होते थे, उस प्रांत की भाषा तथा बोलियों का रंगढंग उनकी रचना में अधिक फलकता था। शौरसेन प्रदेश में इस प्रकार की पद्य रचनाएँ बहुत अधिकता से हुई, अतः पड़भाषा ने शनैः शनैः साहित्यिक शौरसेनी का रूप धारण कर लिया। उक्त भाषा में शौरसेव प्रदेशों की अनेक बोलियों के शब्द तथा रूप अधिकता से बढ़ते जाते थे; पर कितने ही शब्द अन्य प्रदेशों की बोलियों के भी मिश्रित हो गए थे । - शौरसेनी क्षेत्र में यद्यपि अनेक रूपों की प्रांतीय भाषाएँ तथा वोलियाँ प्रचलित थीं, तथापि वे निम्नलिखित भेदों में विभक्त हो सकती हैं---- ( १ ) राजपूतानी मारवाड़ी, मेवाड़ी, जयपुरी इत्यादि । ( २ ) मध्यभारती ग्वालियरी, बुंदेलखंडी इत्यादि । ( ३ ) अंतर्वेद प्रांतीय - पश्चिम प्रांतीय अर्थात् बजभाषा पूर्व प्रांतीय अर्थात् कन्नौजी, वैसवाड़ी, अवधी इत्यादि ।' ४६
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