की होती हैं। श्री जगन्नाथदास रत्नाकर, बी० ए० ३-८१. उनमें से कुछ, जो साहित्यिक ब्रजभाषा के अनुकूल हैं, निदर्शनार्थ नीचे लिखी जाती हैं - ( १ ) प्रयोग - बाहुल्य ग्रहण -- प्रायः ऐसा होता है कि किसी पद कं दो रूपों में से एक का प्रयोग बहुतायत से तथा बहुत लोगों के द्वारा होता है, और अन्य का न्यून तथा अल्प लोगों के द्वारा । ऐसे पों के रूपों में से संशोधकों को अन्वेषण करके प्राय: बहु- प्रयुक्त रूपों को ग्रहण करना पड़ता है । (२) शिष्ट प्रयोग-प्रहण कितने ही पदे के दो रूपों में से एक रूप तो विशेषतः श्रेष्ठ कवियों की रचनाओं में दिखाई देता है. और अन्य रूप सामान्य जनों की । ऐसे पदों के रूपों में से संशो- धक की शिष्ट जनों के प्रयोग ग्राह्य होते हैं । ( ३ ) लोक व्यवहार - ग्रहण -- जब प्रयोग बाहुल्य तथा शिष्ट प्रयोग से किसी पद के दो रूपों में से ग्राहा रूप का निर्णय संदिग्ध रह जाता है, तब संशोधक को लोक व्यवहार का विचार करना पड़ता है, और वह तदनुसार रूप का ग्रहण करता है। प्रत्युत कभी कभी प्रयोग बाहुल्य तथा शिष्ट प्रयोग के निर्णय के विरुद्ध भी लोक व्यव- हार का अनुसरण उचित होता है । ( ४ ) पूर्वरूप - कभी कभी किसी पद के ग्राह्य रूप का निर्धा- रण करने के निमित्त निर्दिष्ट भाषा के पहले की भाषा में उक्त पद के स्वरूप की जाँच करनी पड़ती है, और तदनुसार ही उसके रूप का ग्रहण किया जाता है । ( ५ ) आपत्प्रयोग- परित्याग - प्रायः पद के दो रूपों के प्रयोगों के विषय में यह बात देखने में आती है कि एक रूप तो कविजनों ने सामान्यतः प्रयुक्त किया है, और अन्य रूप छंद अनुप्रासादि की आपत् अर्थात् आवश्यकता से । ऐसे रूपों पर विचार करके संशो- धक को प्रापत्प्रयुक्त रूपों का परित्याग करना उचित होता है ( ६ ) आपत्प्रयोगानुकरण- परित्याग - बहुधा लोग अपने पूर्व के कविजनों के आपत्प्रयुक्त रूपों की देखा देखी बिना किसी आवश्यकता
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