श्री इंद्रदेव तिवाड़ी एम० ए० ३८६ उसकी वृद्धि के साधन, प्रवातसुभग सदा सुखदायक भव्य भवन रहने को हो, काम करने के घंटों की संख्या कम हो जाय, श्रम- जीवी लोगों के लिये अधिक सुविधापूर्ण परिस्थितियाँ हो जायें; इत्यादि । यद्यपि ये सब वांछित अवश्य हैं तथापि उन्नति की सीमा यहीं समाप्त नहीं हो जाती । उससे तात्पर्य है उच्चतर संस्कृति, अधिक शिक्षा प्रसार, न्याय, औचित्य, एवं दूसरों के स्वत्वों और अधिकारों की स्वीकृति । समाज जीवन के विकास में, विशेषतः मानसिक और नैतिक उत्थान में ही समाज की उत्पादन-शक्ति अपना काम करती है । क्रमश: सामाजिक प्रकृति अथवा व्यक्तित्व का निर्माण करता है। समाज संगठन का मुख्य उद्देश्य है सामाजिक व्यक्तित्व अथवा बलशाली, बुद्धिशाली, नैतिक मनुष्य का निर्माण । यदि मनुष्य दिन दिन नैतिक पथ पर आगे बढ़ रहा है, उसकी बुद्धि तीचा हो रही है. उसमें सहानुभूति की मात्रा बढ़ रही है, तब वह वास्तव में उन्नति कर रहा है, और वह समाज - शरीर जिसका वह एक अंग है अवश्य सार्थक और सुयोग्य है। इसके विपरीत यदि वह समाज के प्रति अपना कर्तव्य छोड़ दे; उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाय; वीरत्व घट जाय; आत्मबल, श्रात्मसंयम, सहानुभूति कम हो जाय तब समझना चाहिए कि वह निश्चय ही अवनत हो रहा है और उसका सामाजिक व्यूह, चाहे बाह्य रूप में अच्छा क्यों न हो, अवश्य अपने उद्देश्य की प्राप्ति में विफल हो रहा है । a वनस्पति तथा जंतु के जीवन विकास में जाति के निमित्त व्यक्ति का खूब कर बलिदान हुआ | पर मनुष्य के विकास में ऐसा नहीं हुआ । उसमें व्यक्ति का ह्रास भी कम हुआ है और साथ ही जाति तथा समाज का अस्तित्व भी स्थिर और दृढ़ बना रहा है। उच्च प्रकार की सभ्यता में, जाति और समाज को बिना किसी , तरह की क्षति पहुँचे, व्यक्तिगत स्वतंत्रता अटूट क्रम से बढ़ती जाती है । समाज का संरक्षण और व्यक्ति की स्वतंत्रता, शक्ति और
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