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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/४५१

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४०८ बालीद्वीप में हिंदू वैभव धर्म बौद्ध धर्म से मिश्रित अवश्य है और भूत-प्रेतों को भी इसमें स्थान दिया गया है । आजकल भी जैसा हिंदुस्तान में पहले रिवाज था या अब भी कहीं कहीं हैं, वहाँ भूत प्रेतों को उच्चाटन करने की रीतियाँ देखी जाती हैं जिनका उल्लेख चाणक्य ने अपने अर्थ- शास्त्र में किया है अथवा कई एक शिलालेखों में पाया जाता है । यह वालीद्वीप के धर्म-ग्रंथ 'कवि' भाषा में लिखे जाते हैं । भाषा प्राचीन काल में यवद्वोप (जावा) में प्रचलित थी । इसका पूरा नाम 'बलकवी' ( Basa-kani ) है जो कि 'कविभाषा' का अप- भ्रंश है और जिसका अर्थ विद्वानों की बोली ही हो सकता है । यह ग्रंथ अब भी तालपत्रों पर लिखे जाते हैं । भारतवर्ष से सन् ईसवी की पहली शताब्दी के लगभग जावा अथवा बालीद्वीप में लोग जाकर बसे ऐसा माना जाता है । हिमा- लय से कन्याकुमारी तक अपनी सभ्यता फैलाकर उन्होंने समुद्र लांघकर भी अपनी उन्नति का परिचय यत्र तत्र भारत के पूर्वतम पहले पहल कब हम लोग वहाँ गए हाँ, इतना कह सकते हैं कि हिंदू प्रदेशों वा द्वीपों में जा जाकर दिया। इसका निश्चित ज्ञान नहीं है। सभ्यता ईसा मसीह की अग्रिम शताब्दियों में पूर्वीय द्वीपसमूहों में अवश्य जा चुकी थी । कोईटई ( Koetei, East Barnes ) में महाराज मूलवर्मन के कई एक खूप पाए गए हैं जिन पर लेख भी खुदे हुए हैं। ये लेख इस बात का अकाट्य प्रमाण एवं साक्षी दे रहे हैं कि वहाँ वैदिक यज्ञ किए गए, यूप अथवा याज्ञिक खंभे खड़े किए गए और उच्च कोटि के ब्राह्मणों अथवा विप्रों को, जिन्होंने वे याग करवाए थे, 'भूरि दक्षिणा' दी गई। इन लेखों का काल चौथी शताब्दी से कम नहीं सन ४१४ ईसवी के लगभग चीनी यात्री फाहियान (Maa ILian) का जावा अथवा सुमात्रा (Ye-po-ti) में जाना और वहाँ उसका ब्राह्मणों को अच्छी स्थिति में देखना इतिहासज्ञ जानते ही हैं जिससे उन दूरस्थ देशों में हिंदू सभ्यता का प्रचार अथक ब्राह्मrites का उस समय स्थापित होना स्पष्ट ही है ।