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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/४५६

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(२१) वात्सल्यरस [ लेखक - श्री अयोध्यासिंह उपाध्याय ] बालक परमात्मा का अधिक समीपी कहा जाता है, उसमें सांसारिक प्रपंच नहीं पाया जाता ! जितना वह सरल होता है, उतना ही कोमल । छल उसे छूता नहीं, कपट का उसमें लेश नहीं । उसके मुखड़े पर हँसी खेलती रहती है, और उसकी चमकीली आँखों से आनंद की धारा बहती जान पड़ती हैं। उसके मुसकुने में जो माधुर्य हैं, वह अन्यत्र दृष्टिगत नहीं ही भोला भाला होता है, उतना ही प्यारा । होता । वह जितना उसकी तुतली बातें' हत्तंत्री में संगीत उत्पन्न करती है, और उसके कलित कंठ का कल- नाद कानों में सुधा वरसाता है । वह दांपत्य सुख का सर्वस्व है, भाग्यवान् गृहस्थ- गृह का उज्ज्वल प्रदीप है, और हैं स्वर्गीय लीलाओं का ललित निकेतन । परमात्मा का नाम आनंदस्वरूप है, बालक इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है | एक उत्फुल्ल चालक को देखिए, इस मधुर नाम की सार्थकता उसके प्रत्येक उल्लास से हो जावेगी ! बालकों की इस आनंदमयो मूर्ति का चित्रण अनेक भावुक कवियों ने बड़ी ही मार्मिकता से किया है। इस रससमुद्र में जो जितना ही डूबा, वह उतना ही भाव-रत्न संचय करने में समर्थ हुआ । एक अँगरेज सुकवि की लेखनी का लालित्य देखिए । वह लिखता है- 'I have no name: I am but two days old;' What shall I call thee I happy am, Joy is my name.' 'Sweet joy befall thee ! •