४१४ वात्सल्यरस Pretty Joy! Sweet Joy, but two days old. Sweet Joy I call thee : Thou dost smile I sing the while, Sweet joy betfall thee P W. Blake. मेरा नामकरण अभी नहीं हुआ है, मैं दो दिन का बच्चा हूँ । तो हम तुमको क्या कहकर पुकारें ? मैं मूर्तिमान उल्लास हूँ, मेरा नाम आनंद है। तो तुमको मधुरतर आनंद प्राप्त हो ! मेरे प्रियतर आनंद ! मेरे मधुरतर आनंद ! मेरे दो दिन के प्यारे बच्चे ! तुझको मधुर से मधुर आनंद प्राप्त हो ! तुम मधुर हँसी हँसो, मुसकुराओ, मैं भी स्वर्गीय गान आरंभ करता हूँ-भोले भाले बच्चे, तुझको अधिकाधिक आनंद प्राप्त हो ! बालभावों का चित्रण करने में, उनके आनंद और उल्लासों के वन में कविकुन्तशिरोमणि सुरदासजी की सुधावर्पिणी लेखनी ने बड़ी ही मार्मिकता दिखलाई है -ग्राहा ! देखिए- सोभित कर नवनीत लिए । घुटुरुन चलत रेनु तनु मंडित मुख दधि-लेप किए || चारु कपोल लोल लोचन गोरोचनतिलक दिए । लट लटकनि मनो मत मधुपगन मादक मदहिं पिए || कठुला कंठ, वज्र, केहरि नख, राजत रुचिर दिए । धन्य 'सूर' एको पल या सुख का सत कल्प जिए ॥ १ ॥ हैं। बलि जाउँ छबोले लाल की । धूसर धूरि घुटुरुवनि रेंगनि, बोलन बचन -रसाल की ॥ छिटिक रहीं चहुँ दिसि जु लटुरियाँ लटकन लटकति भाल की । मोतिन सहित नासिका नथुनी कंठ कमल-दल-माल की ।। कछुके हाथ कछू मुख माखन चितवनि नैन बिसाल की । • सूर सु प्रभु के प्रेम मगन भई ढिग न तजनि व्रज बाल की | २ ||
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