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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/४६६

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श्री अयोध्यासिंह उपाध्याय न भावहीनेोस्ति रसो न भावो रसवर्जितः । परस्परकृता सिद्धिरनयोरस भावयोः || ४२३ "रस के बिना भाव नहीं और भाव के बिना रस नहीं होते | इन रस और भावों की सिद्धि एक दूसरे पर निर्भर है ।" रस और भावों में इतनी स्पष्टता होने पर भो रस और भाव के निरूपण में एकवाक्यता नहीं है। विभिन्न मत इस विषय में भी हैं, और अब तक कोई ऐसा सिद्धांत निश्चित नहीं हुआ, जो सर्वमान्य हो । ऊपर आप यह वाक्य देख चुके हैं, 'कंचिदाहुरेक एव शृंगारो रस इति' जिससे पाया जाता है कि कोई कोई प्राचार्य श्रृंगार रम को ही रस मानते हैं, और किसी रस को रस मानना ही नहीं चाहते। साहित्यदर्पणकार लिखते हैं कि उनके पितामह पंडित- प्रवर नारायण अद्भुत रस को ही रस मानते हैं, अन्य रसों को वे स्वीकार ही नहीं करते । यथा- "रसे सारश्चमत्कार: सर्वत्राप्यनुभूयते । तचमत्कार सारत्वे सर्वत्राप्यद्वतो रसः ।। तस्मादद्भुतमेवाह कृती नारायणो रमम् । " "सब रसों में चमत्कार साररूप से प्रतीत होता है। और चमत्कार ( विस्मय ) के साररूप ( स्थायी ) होने से सब जगह अद्भुत रस ही प्रतीत होता है, अत: पंडित नारायण केवल एक अद्भुत रस ही मानते हैं ।" उत्तररामचरितकार करुण रस को ही प्रधान मानते हैं, वे लिखते हैं- एको रसः करुणा एव निमित्तभेदा- द्भिन्नः निः पृथक् पृथगिवाश्रयते विवर्त्तान् । आवर्त्तबुदुदतरंगमयान् विकारान अम्भो यथा सलिलमेव हि तत्समस्तम् ।