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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/४७२

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श्री अयोध्यासिंह उपाध्याय बिरहिन उठि उठि भुई परै दरसन कारन राम । मूए पाछे देनुगे सो दरसन केहि काम || सूए पाछे मंत्र मिली कहै कबीरा राम । लोहा माटी मिल गया तब पारस केहि काम || सब रंग ताँत रबाब तन बिरह बजावै नित्त और न कोई सुन सके के साई के चित्त ॥ पिया मिलन की आस रहीं कब लौं खरी । ऊँचे नहि चढ़ि चढ़ि जाय मनें लज्जा भरी ॥ पाँव नहीं ठहराय चहूँ गिरि गिरि परूँ । फिरि फिरि चढ़हुँ सम्हारि चरन आगे अंग अंग थहराय तो धरूं ॥ बहुविध डर रहूँ । करम कपट मग घेरि तां भ्रम में परि रहूँ || बारी निपट अनारि तो झानी गैल हैं । अट पट चाल तुम्हार मिलन कस होइहै || अंतर पट दं खोल सब्द उर लावरी । ४२६. दिल बिच दास कबीर मिलें तोहि बावरी || > f काव्य इन पंक्तियों में कैसा आत्मनिवेदन है, उसे बतलाना न होगा। प्रत्येक शब्द में वह व्यंजित है। आत्मनिवेदन का अर्थ आत्मा- त्सर्ग लीजिए, चाहे आत्मदशानिवेदन दोनों ही भाव उनमें मैौजूद हैं। अतएव उनमें भक्ति रस का प्राचुर्य स्पष्ट है प्रकाशकार ने रस का जो व्यापक और मानसिक अवस्था-प्रदर्शन संबंधो लक्षय लिखा है, भक्ति में वह जितना सुविकसित पाया जाता है, अन्य रस में उसका उतना विकास नहीं देखा जाता । वे लिखते हैं- 'पानक रस के समान रस को आस्वाद्य होना चाहिए उनके कहने का भाव यह है कि जैसे पीने का रस चोनी, दूध, फेवड़ा, इलायची आदि भिन्न भिन्न पदार्थो से बनकर उन सबसे पृथक् एक विचित्र स्वाद रखता है, और अधिक स्वादिष्ठ भी होता है, उसी प्रकार विभावादि के मिश्रण से जो रस बनता है, उसका