४३० वात्सल्यरस आस्वादन भी अपूर्व और विलक्षण होना चाहिए। गुथा भक्ति में यह और रसों से अधिक पाया जाता है । जब भगवद्विषयक स्थायी भाव, परमानंदस्वरूप परमात्मा प्रालंबन विभाव को पाकर पुलक अश्रुपात आदि अनुभावों एवं दर्प, आवेग, विवोध, औत्सुक्य आदि संचारी भावों के सहारे भक्ति में परिणत होता है, उस समय भक्त- जनों के हृदय में जिल अलौकिक रस का आविर्भाव होता है, कितना लोकांत्तर तथा देवी विभूति-संपन्न देखा जाता है, क्या यह विदित है । क्या उसी के आस्वादन जनित आमोद का वर्णन इन शब्दों में नहीं है ?- "त्वत्साक्षात्करणाहाद विशुद्धाव्धिस्थितस्य मे । वह सुखानि गोष्पदायंत. " -भागवत तुम्हारे साक्षात्करण आह्लाद के विशुद्ध समुद्र में स्थित होने के कारण मुझको समस्त सुख गोष्पदसमान ज्ञात होते हैं | क्या उसी रसास्वादनकारी की अदभुत दशा का उल्लेख यह नहीं है ? कचिदन्यच्युतचितया कचिद्धति नंदन्ति बदत्यला किकाः । नृत्यंति गायंत्यनुशीलयंत्यजं भवंति तूष्णीं परमेत्य निर्वृताः ॥ अच्युत का चिंतन करके कभी रोते हैं, कभी हँसतं, आनंदित होते और अलौकिक बातें कहते हैं। कभी नाचते, गाते, भगवान का अनुशीलन करते और परमात्मा की ग्राप्त कर संतोष लाभ करने के उपरांत मौन हो जाते हैं : क्या उसी रस का प्याला पीकर भक्तिमयी मीरा ने यह नहीं गाया ? मेरे गिरधर गोपाल दूसरा न कोई । जाके सिर मार मुकुट मेरो पति सेोई ॥ साधुन सँग बैठि बैठि लोकलाज खोई । अब वो बात फैल गई जानत सब काई ||
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