४४२ बात्सल्यरस को भी निछावर कर देने को जी चाहता है । संसार में बालक मुख अवलोकन के आनंद का अनुभव माता ही को हो सकता है । और कोई संसार में इस अनुभव का पात्र नहीं, पिता भी नहीं । P बालक कृष्णा भी पिता ही के वर्ग का है, इसी लिये माता ने कहा तेरा पुण्यपुंज ऐसा कहां! फिर जो आनंद ऐसा अलौकिक और अनिर्वच- नीय है, कि जिसको रसना भी नहीं कह सकती, जिसको कोई कोई जानता ही भर है, किंतु कह वह भी नहीं सकता, उसे वे कैसे कहें। यही तो ब्रह्मानंद है ! जिसकी अधिकारिणी कोई कोई यशोदा जैसी भाग्यशालिनी माता ही हैं, स्वयं प्रवतारी बालक कृष्ण भी नहीं । अपने मुख को आप कोई कैसे देख सकता है, जब तक विमल बोध का दर्पण सामने न होवे । चमत्कार के विषय में तो बात्सल्यरस वैसा ही चकितकर है, जैसा कि स्वयं बालक जब बालक मूर्ति ही चमत्कारमयी है तो उससे संबंध रखनेवाले भाव चमत्कृतकर क्यों न होंगे ! बालक का जन्मकाल कितना चमत्कारमय हैं और उस समय चारों और कैसा रस का स्रोत उमड़ पड़ता है, इसका अनुभव प्रत्येक हृदयवान पुरुप को प्राप्त है । उस समय के गीतों के गान में जो कंकार मिलती सोहरी में जो विमुग्धकरी ध्वनि पाई जाती है, वह किसी दूसरे अवसर पर श्रुतिगोचर नहीं होती । संतान ही! वंश-वृद्धि का आधार, पिता का आशास्थल, माता का जीवनसर्वस्व और संसार-बीज का संरक्षक हैं। उसी में यह चमत्कार है कि जैसी ममता उसकी पशु पक्षो कीट पतंग की होती है, वैसी ही देवता मनुष्य और दानवों को भी । उसकी लीलाएँ जितनी मनोरंजिनी हैं, जितनी उसमें स्वाभाविकता और सरलता मिलती है, मानव जीवन की किसी अवस्था में उलनी मनोरंजन आदि की सामग्री नहीं पाई जाती । ये बातें भी चमत्कारशून्य नहीं । नीचे मैं वात्सल्यरस के कुछ पद्य लिखता हूँ। आप देखें, इनमें कैसा स्वाव-चित्रण और कविता- गत चमत्कार है । बालक जैसे सरल और कोमल होते हैं, वैसे ही
पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/४८५
दिखावट