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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/४८६

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श्री अयोध्यासिंह उपाध्याय ४४३ उनके भाव और विचार भी सरल और कोमल होते हैं। उद्धृत कवि- ताओ में आपको उनका बड़ा ही मनोहर स्वरूप दिखलाई पड़ेगा । मैंया ! मैं नांहीं दधि खायो । ! 3 ख्याल परे ये सखा सबै मिलि मेरे मुख लपदायो || देखि तुही छीके पर भाजन ऊँचे घर लटकायो । तुही निरखि नान्हें कर अपने मैं कैसे करि पायो || मुख दधि पछि कहत नंदनंदन दो ना पीठ दुरायो । बारि साँट मुसुकाइ तबहिं गहि सुत की कंठ लगायो || बाल विनोद मोद मन मोलो भगति प्रताप दिखायो । सूरदास प्रभु जसुमति के सुख शिव विरंचि बौरायो || शिव विरंचि बावले बने हो या न बने हो, किंतु महात्मा सूरदास जी का बड़ी हो सजीव भाषा में सहज बाल-स्वभाव का चित्रण अत्यंत मार्मिक और हृदयग्राही है । एक एक चरण में विमुग्धकारी - भाव हैं और उनको पढ़कर रसोन्माद सा होने लगता है । चमत्कार के लिये इतना ही बहुत है। शिव विरंचि का उन्माद तो बड़ा ही चम- त्कारक है, संभव है हमारे दिव्यचक्षु महाकवि ने इसकी अवलोकन बालक कृष्ण की विचित्र लीला क्या नहीं कर सकती ! अबहिं रहनी दे गई बहुरो फिरि आई । किया हो । सुनु मैया ! तेरी सौ करौ याकी टेंब लग्न की सकुच वेंचि सी खाई ॥ या व्रज में लरिका घने हैं। ही अन्याई । मुँहलाए मूँडहि चढ़ी अंतहु अहिरिन तोहि सूधी कर पाई ।। सुनि सुत की अति चातुरी जसुमति मुसुकाई । ' तुलसिदास ग्वालिनि ठगी, आयो ने उतर कछु कान्ह ठगौरी लाई || अहोरिन ने भी अच्छे घर बैना दिया था, बेचारी दो दो बार उलाहना देने आई, पर फिर भी उसी का मुँह की खानी पड़ो । उसने मुँह की ही नहीं खाई, भोले भाले बालक द्वारा ठगी भी गई। दूध दही तो गया ही था, उल्लू भी बनी, जवाब तक न सुझा बालक कृष्ण ने ऐसी बातें गढ़ीं कि यशोदादेवी की मुसकाना ही