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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/४९२

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श्री कृष्णचंद्र विद्यालंकार ४४६ उक्त श्लोक के बाद ग्रंथ की समाप्ति पर लेखक लिखता है. दृष्ट्वा विप्रतिपत्तिं बहुधा शास्त्रेषु भाष्यकाराणाम् । स्वयमेव विष्णुगुप्तश्चकार सूत्रं च भाष्यं च ॥ अर्थव्यकारों के शास्त्रों में भिन्न भिन्न मत देखकर विष्णु- गुप्त ने स्वयं सूत्र और भाष्य दोनों किए । इन सब श्लोकों से चार बातें ज्ञात होती हैं--- १ - इस ग्रंथ का कर्ता वह कौटिल्य है, जिसने नंदों का नाश किया। २ - कौटिल्य और विष्णुगुप्त एक व्यक्ति के दो नाम हैं। ३ - यह ग्रंथ नरेंद्र ( चंद्रगुप्त ) के लिये बनाया गया । ४ - इस ग्रंथ में सूत्र और भाष्य एक ही व्यक्ति के किए हुए हैं अर्थात संपूर्ण मथ एक ही विद्वान की रचना है । - नंद के नाश के संबंध में विष्णुपुराण में लिखा है- महापद्मः तत्पुत्राश्चैकं वर्षशतमवनीपतयो भविष्यन्ति । नवैव । तान्नन्दान कौटिल्यो ब्राह्मणस्समुद्धरिष्यति । तेषामभावे मौर्याश्च पृथ्वीं भोदयन्ति । कौटिल्य एव चंद्रगुप्त राज्येऽभिपेक्ष्यति । तस्यापि पुत्रो बिंदुसारो भविष्यति । तस्याप्यशोकवर्धनः । ( ४.२४ ) अर्थ- महापद्मनंद और उसके नौ पुत्र एक सौ वर्ष तक राज्य करेंगे । कौटिल्य नामक ब्राह्मण उन नंदों का नाश करेगा। उनके अभाव में मौर्य पृथ्वी का उपभोग करेंगे । कौटिल्य ही चंद्रगुप्त को गद्दी पर बिठायेगा । उसका पुत्र बिंदुसार होगा और उसका पुत्र अशोकवर्धन जिस 'नरेंद्र' के लिये यह शासन-विधान मौर्य चंद्रगुप्त के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है। बनाया गया है, वह पुराणों में चंद्रगुप्त का दूसरा नाम 'नरेंद्र' भी मिलता है । ब्रह्मांड और वायु पुराण नंद-नाश के प्रकरण में लिखा है- ५.७ भुक्तां मह वर्षशतं नरेन्द्रः संभविष्यति । |