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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/५०६

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श्री कृष्णचंद्र विद्यालंकार ४६३ अर्थशास्त्र में वितरण का स्पष्ट विधान न होने का यह अर्थ नहीं कि मैगस्थनीज से वह असहमत है। कौटिल्य भी नहरी का वर्णन करता है ( कुल्यावापानांच कालतः ) । (इ) मैगस्थनीज लकड़ी के भवनों का उल्लेख करता है और चाणक्य पत्थरों के । पहले तो मैगस्थनीज का कथन पूर्ण सत्य नहीं मालूम होता, क्योंकि पाटलिपुत्र के खोदने से वहाँ से ईट पत्थरों का सामान भी बहुत मिला है। दूसरे जिस प्रकरण ( पृष्ठ ५२ ) का अर्थ विंटर - निट्ज ने पत्थर के मकान किया है, वह प्रकरण डाकर शामशास्त्री की सम्मति में सड़कों के संबंध में है, भवनों के नहीं। फिर कौटिल्य काभवनों का विरोधी भी नहीं है। उसने भूमिगृह के काष्ठ कं बनवाए जाने का उल्लेख किया हैं ( प्र० ५८८ ) । (ई) मैगस्थनीज ने दास प्रथा के संबंध में लिखा है कि वह नहीं थी और अर्थशास्त्र से उसका होना पाया जाता हैं 1 भारतवर्ष में दासों के साथ एक परिवार सदस्य का सा व्यवहार होता था, इसलिये विदेशी यात्री उसे प्रत्यक्ष अनुभव नहीं कर सकत थे । डाकुर जौली जिस याज्ञवल्क्य स्मृति के आधार पर अर्थशास्त्र का बनना मानते हैं, उसी में दास प्रथा का स्पष्ट वर्णन है । ( उ ) ग्रोक यात्रियों के वर्णनों और अशोक के शिलालेखों से उस उन्नत भारत का ज्ञान नहीं होता, जिसका ज्ञान अर्थशास्त्र के पढ़ने से होता है। मैगस्थनीज ने केवल पाँच धातुओं का वर्णन किया है और स्ट्रैबो लिखता है कि भारतीयों को खान खोदने और धातु गलाने का ज्ञान नहीं है । परंतु अर्थशास्त्र का लेखक खान पर राज्य के अधिकार, टकसाल में सिक्के बनाने, धातुओं के आभूषण आदि बनाने से परिचित था। प्रो० विंटरनिट्ज लिखते हैं कि अर्थशास्त्रकार पारे का प्रयोग कर रासायनिक रीति से कृत्रिम सोने के बनाने का भी वर्गान करता है । यहाँ भी ग्रोक यात्रियों के वर्णन सत्य नहीं जान पड़ते । मौर्य- काल और उससे पूर्व के सिक्के, गहने ( पाटलिपुत्र से मिली बढ़िया