(२३) ककुत्स्थ [ लेखक - राय कृष्णदास ] ऐवाकों की उस शाखा का, जिसमें हरिश्चंद्र, रघु, राम इत्यादि का प्रादुर्भाव हुआ था, एक नाम "काकुत्स्थ" भी है । पुराण इस नाम की कथा यो देते हैं कि नेता में देवगण असुरों से, संग्राम में, हार गए । तब उन्होंने इक्ष्वाकु के पौत्र पुरंजय की सहायता चाही। राजा ने कहा कि यदि इंद्र मेरे वाहन बने तो मैं लड़ सकता हूँ । इंद्र ने उनकी सवारी के लिये वृषभ का रूप धारण किया और उन्होंने उस वृषभ के ककुद्दू ( डोल ) पर स्थित होकर असुरों को पराजित किया। विष्णुपुराय का लेख है- पुरा हि त्रेतायां देवासुरयुद्धमतिभीषणमभवत् । बलिभिरसुरैरमराः पराजिताः..... राजर्षेश्शशादस्य तनयः.... { 1 .. अमराः तत्र चाति- ... पुरंजयो नाम पुरंजय सकाश- माजग्मुरुचुश्चैनम् । भो भो चत्रियवर्याऽस्माभिरभ्यर्थितेन भवताऽ स्माकमरातिवधोगतानां कर्तव्यं साहाय्यमिच्छामः तद्भवताऽस्माकम- भ्यागतानां प्रणयभंगो न कार्य इत्युक्तः पुरंजयः प्राह - त्रैलोक्यनाथा योऽयं युष्माकमिंद्रः शतक्रतुरस्य यद्यहं स्कंधाधिरूढो युष्माकमराति- भिस्सह्न योत्स्ये तदहं भवतां सहायः स्याम् । इत्याकर्ण्य समस्त- देवैरिंद्रेण च वाढमित्येवं समन्विष्टम् । ततश्च शतक्रतोर्वृष-रूपधा- रिः ककुदि स्थितोऽतिरे। षसमन्वितो असुरान्निजवान यतश्च | निपदितमतश्चासौ ककुत्स्थ संज्ञामवाप || देवासुर संग्रामे समस्तानेव वृपमककुदि स्थितेन राज्ञा देतेयबलं - विष्णु अं० ४ ० २, २२–३२ । अर्थात् -- पुराने जमाने में, त्रेता में, देव और असुरों का बड़ा भीषण युद्ध हुआ था । उसमें दैत्यों ने अपने विशेष बल के कारण देवताओं को हरा दिया। उस समय राजर्षि शशाद का पुत्र पुरंजय
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