राय कृष्णदास ४६८ इन्हीं सूक्तों की अन्य ऋचाओं में भी यही बात ध्वनित है । अथर्ववेद ५ ८७-८८ में भी ये मंत्र कुछ भेद से आए हैं। अथर्व ३, ४-६ में भी इंद्र राष्ट्र का अधिष्ठाता कहा गया है। इसी से राजा के अभिषेक को ऐंद्र महाभिषेक कहते थे ( ऐतरेय ८, १५ ) । पौराणिक काल में भी लोग यह बात न भूले थे । के निम्नलिखित वाक्य में इसी की ध्वनि है- स्थानर्मेंद्र क्षत्रियाणां संग्रामेष्वपलायिनाम्-- वायु पुराण - वायु पूर्वार्ध ८, १६६ । पुराणों से ऐसे दर्जनों अवतरण दिए जा सकते हैं । अस्तु, कालि- दास के समय तक भी इस तत्त्व का परिज्ञान था। उन्होंने स्पष्ट लिखा है- ऋद्धं हि राज्यं पदमैंद्रमातुः । - रघु० २, ५० । सो, ऐसे राष्ट्र पर राज्य करने के लिये जब राजा का वरण होता था तब उससे कहा जाता था- त्वा विशेो वृणतां राज्याय त्वामिमाः प्रदिशः पंच देवीः । वर्मन् राष्ट्रस्य ककुदि श्रयस्व ततो न उग्रो विभजा वसूनि ॥ - अथर्व ३, ४, २ । अर्थात् - तुम्हें विश् ( = जनता, राष्ट्र ) राज्य करने के लिये वरण करें ( चुनें)। ये पांच देदीप्यमान दिशाएँ तुम्हें राज्य के लिये वरण करें। राष्ट्र के ककुद — डील पर (अर्थात् ऊँचे स्थान पर, । 'आला मुकाम' पर) बैठा और ऊर्जस्वितापूर्वक विभव का वितरण करो। - इस मंत्र में प्रयुक्त ' ककुद' शब्द उच्च पद के लिये आया है, इसमें तो कोई संदेह ही नहीं । आगे, संस्कृत में भी यह बराबर इसी अर्थ में व्यवहृत हुआ है-
- दिशाथों की संख्या चार ( पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण ) से श्राट
( चार दिशाएँ और चार कोण ) और फिर दस तक ( पूर्वोक्त या दिशाएँ और अंतरिक्ष तथा भूमि, ऊपर, नीचे, ) पहुँची है। यहाँ पांच दिशाओं से संभवतः चार दिशाएँ और पांचवां अंतरिक्ष विवक्षित हैं ।