श्री काशीप्रसाद जायसवाल, एम० ए०, विद्यामहोदधि १३ श्रनिमित्र का वंश साकेत में अमिमित्र के पिता पुष्यमित्र शुंग के वंशज राज्यं करते थे यह बात अयोध्या के धनमित्रवाल शिलालेख से साबित है। राजा शालिशक पुराणों के अनुसार यह राजा मौर्यवंश में अशोक के बेटे सुयश अथवा कुनाल का पुत्र था। इसके बड़े भाई संप्रति ने जैनधर्म का खूब फैलाया 1 मालूम पड़ता है कि शाक्तिशुक ने इसकी नकल की । अशोक ने अपने शिलालेख में पात 'धर्मविजय' की स्थापना करें। कहा है कि मेरे बेटे और शालिशूक के बारे में यहाँ गर्गसंहिता में लिखा है कि यह अधार्मिक महात्मा राजा धर्मविजय नाम की स्थापना करनेवाला हुआ, अर्थात् इसने अवैदिक धर्म चलाया । पाटलिपुत्र का कदम हित 'हित' ( मेड़ या पुश्ता ) के अर्थ का पता मनु (-२७४ ) के ग्रामघाते हितभंगे वाले कानून से लगता है। कर्म का 1 पुश्ता पिछले साल की खुदाई में यहाँ पटने के दक्खिन भाग में निकला है। १४ फुट की मिट्टी की मोटी दीवार हैं। साल के लाठों से जकड़ी हुई है । यही शहरपनाह थी । इस पर शनी यदि यंत्र रखे हुए थे। (अ० २४, अर्थशास्त्र कौटिलीय) पत्र भी इस दीवार के मोर्चे खुदकर बाहर हुए हैं जिनमें शस्त्र पाए गए हैं। इसी दीवार पर लड़ाई हुई जिसमें यवनों को हारकर पीछे हटना पड़ा । कलि का शेष भाग 7 । जैसे यहां यवनराज्य कलिशेष में लिखा है वैसे ही वायुपुराण ( ६६ / ३८८-२० ) में भी लिखा है । काई १५० या १०० वर्ष पूर्व यहाँ जमे थे। यवन विक्रम संवत से इससे कलिशेष १५०- १०० वि० पूर्व हुआ । मनु ने ( १ । ६८-७० ) १२०० वर्षं कलि का माना है । श्रीकृष्ण की मृत्यु ( यहाँ कृष्णा द्रौपदी की मृत्यु )
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