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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/५९

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१६ राम-रावण युद्ध बहुत करें। जो पंडित कथा बाँचति रहैं उइ वहि का प्रेमी जानि- T कै निकी तना बैठावे और खूब खातिर करें याक दिन पंडित पूँछेन कि भगानि भाई तुम एतना वावत काहे का है। । तुम का का जानि परत है। यह सुनि के अहिरवा औरौ ज्वार ज्वार खावै लाग । वह व्वाला कि महराज मोरे एक भैसि वियान रहें । वह नजरयाय मैं औ पड़ौना का नगच्याय न देई । पड़ोना दिन भरि चिल्लान और सँभली जून मरिगा । वही की तना पंडित तुमहू दिन- भरि चिल्लाति हो । यहि ते माहि का डेर लागत है कि कतै तुम- हूना वही की नाहिन मरि जाव" परंतु कविवर तुलसीदासजी ने इसी भाषा में रामचरितमानस लिखकर उसे ऐसी ऊँची सिडटी पर चढ़ा दिया है कि वह श्रेष्ठ काव्य की जननी बन गई हैं। साथ ही साथ एक और विशेष महत्त्व की बात का पता लगा है । वह यह है कि सब से प्राचीन महायुद्ध इसी के उदरांचल के भीतर हुआ । त्रेता युग में राम उत्तर कोशल के द्वार से पैदल चलकर दक्षिणा या महाकोशल की सीमा की पहुँचे और उन्होंने उस सम्राट् की, जिसने उनकी प्रिय पत्नी का हरण कर लिया था, हराकर विजय का डंका बजाया और उभय कोशलों का आधिपत्य प्राप्त कर प्रजा- पालन और शासन का वह नमूना दिखला दिया जो 'रामराज' शब्द के उच्चारण करते ही प्रत्येक हिंदू के हृदय में आदर्श का चित्र खड़ा कर देता है । क्या कोई ऐसा भी हिंदू है जिसने राम, सीता रावगा और लंका या रामायण का नाम न सुना हो ? भग- वान् राम की पत्नी सीता को लंका का राजा रावण हर ले गया, इससे राम ने रावण को मार डाला । इसी कथा को तो रामा- या कहते हैं । राम अयोध्या के राजा के ज्येष्ठ पुत्र थे । अयोध्या श्राज तक उसी नाम से स्थिर है। किसी को उसके विषय में कभी शंका न हुई और न है । परंतु रावण की लंका के विषय में बहुत बड़ा भ्रम है । यथार्थ में लंका जातिवाचक संज्ञा है । कई भाषाओ में लंका का अर्थ द्वीप, टापू या टीला होता है। इसके कारण और