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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/६२

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रायबहादुर श्री दीरालाल बी० ए० ", १८ यद्यपि कई लोगों ने महोबे के कीर्तिसागर, बिलहरी के लछमन- सागर और सागर जिले के सागर सदर मुकाम और उसके तालाब - का हाल, जिसके कारण नगर और जिले का नाम पड़ा, अवश्य सुना होगा और कदाचित् छत्तीसगढ़ की महासमुद्र नामक तहसील का भी नाम सुना होगा, तथापि उनका ध्यान इस बात पर पूर्णरूप से आकृष्ट नहीं हुआ कि बड़े बड़े जलाशय भी सागर कहलाते हैं 1 लोग बहुधा सागर के एक ही अर्थ अर्थात् समुद्र का चिंतन कर भ्रम में जाते हैं। दंडकारण्य इस प्रकार के सागरों से भरा हुआ था। वहाँ अभी तक बड़े बड़े तालाबों की बहुलता है । वस्तुतः दंडक शब्द का शावरी भाषा में अर्थ ही "जलमय" या " जलप्लावित" होता है। वही अर्थ जनस्थान का होता है जो शावरी जैतान का संस्कृत रूप है । अमरकंटक की तली में आज तक एक बड़ा भारी दलदल है जिसको कोई पार नहीं कर सकता । पड़ इस पर मध्य प्रदेश के प्रथम चीफ कमिश्नर ने कोई साठ वर्ष पूर्व हाथी पर चढ़कर कुछ दूर जाने का प्रयत्न अवश्य किया था, परंतु हाथी धँस जाने से उक्त साहब बहादुर को कष्ट सहकर वापिस आना पड़ा । से सरलता से अनुमान किया जा सकता है कि राम के समय में वहाँ पर पानी का कितना भारी संग्रह रहा होगा । उसको यदि सागर की उपमा दी गई रही हो तो कौन सी असंगत बात है ! आजकल के लोग भी अमरकंटक की चोटी पर चढ़कर नीचे की और जब दृष्टिपात करते हैं तो साननद के जल पर नज़र पड़ते ही सहसा उनके मुख से निकल पड़ता है 'यह कौन समुद्र भरा है' । सोनभद्र इसी अमरकंटक से निकला है। वहीं से नर्मदा का भी निकास है। परंतु नर्मदा नव वधू के समान अपना कोश छिपाए हुए है। सोन मानों बरात सजाकर अपने वैभव की प्रदर्शिनी करता है । * अस्तु, अमरकंटक के किनारे का ही जलाशय सागर स्मरण रहे कि एक पौराणिक कथा के अनुसार नर्मदा और सोन का विवाह होनेवाला था, परंतु कुछ अनबन हो जाने के कारण पूरा नहीं हो पाया।