२० राम-रावण युद्ध गया है, परंतु शत योजन उससे इतना ही बोध होता बड़ा था। कई समीपस्थ या महासागर था जिसको तैरकर ( या काव्य की भाषा में कूदकर ) 'हनुमान लंकापुरी को पहुँच गए थे और अंत में राम ने इसी पर सेतु बाँधकर अपने वानरों की सेना का रावण की राजधानी में प्रवेश करवाया था 1 इस स्थल में शिव के मंदिरों की बहुतायत है 1 कई एक तो बिलकुल टूट फूट गए हैं, केवल विशाल लिंग एकाकी खड़े यत्र तत्र दृष्टिगोचर होते हैं। राम के जमाने में लंका-तटस्थ जलाशय का विस्तार सौ योजन बतलाया शब्द ही अनुमान का संकेत करता है। है कि उसका विस्तार अन्य तालाबों से स्थानों के नामों पर से भी समर्थन होता है कि लंका यहीं पर थी । यथा अमरकंटक के दक्षिण में अब तक लवन नामक परगना है जिसकी भूमि आस पास की भूमि से नीची है । कदाचित् बहुत नीची संभवत: पानी से भरी रही हो । लेखों में लंका की स्थिति लवण सागर में बतलाई गई है । से प्राचीन काल में प्राचीन इस पर उठता है कि वर्तमान लवन की स्थिति क्या केवल आकस्मिक हैं या प्राचीनकालिक याथातथ्य की स्मारक है ? में "लक्ष्मणेश्वर" नामक शिवालय खरौद गाँव में कहा जाता है कि वहाँ खर दूषण से युद्ध हुआ था । पुनः इसी प्रांत विद्यमान है । लक्ष्मणेश्वर के मंदिर के अस्तित्व से यह सहज भावना उत्पन्न होती है कि उसके आस पास रामेश्वर मंदिर भी कहीं रहा होगा | उसको उस स्थल पर होना चाहिए जहाँ पर से राम ने सेतु बाँधने का काम आरंभ किया था । कालांतर में सेतु तथा जलाशय आदि के मिट जाने पर क्या मंदिर का मिट जाना कोई आश्चर्य की बात है ? रामायणी कथा प्रसंग का मनन करने से जान पड़ता है कि सागर नामक एक स्थानीय सरदार भी था जिसका प्राधिपत्य इस विस्तीर्ण जलाशय पर था । इसके बीच में भी एक टापू था जहाँ पर वह संभवतः रहता था। मांगर ने राम सेना के उतरते समय रोक टोक की थी, परंतु जब राम ने उसके विध्वंस कर डालने की धमकी दी तब वह }
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