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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/६७

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30 ક राम-रावण युद्ध पर्वत था जहाँ पर सुशी से भेंट हुई। इसके निकट ही थीम का भाई बालि रहता था: चित्रकूट छोड़ने पर जिवने स्थलों के नाम बतलाए गए हैं उनकी स्थिति निश्चयपूर्वक स्थिर नहीं हुई है। वापि रामायण में जो दूरी का हिसाब बताया गया है, उससे प्रकट होता है कि चित्रकूट से सुतीक्ष्ण का आश्रम प्राय: ३० मील था और वहाँ से पंचवटी लगभग ४८ सील पर थी। पंचवटी से किष्किंधा प्रायः १५ मील थी । इस प्रकार चित्रकूट से किष्किंधा सौ मील से अधिक दूरी पर नहीं थो । यदि वर्तमान रूढ़ि के अनुसार किष्किंधा निजाम के राज्य के दक्षिणीय अंतिम छोर पर अनगुंडी के पास मानी जाय तो पंच- वटी से सीधी रेखा में उसका फासला लगभग ४०० मील पड़ता चाहे आप नासिक की पंचवटी मानें या बस्तर की पर्णशाला को मानें। ढूँढ़ते भटकते हुए लोगों को अनगुंडी को पहुँचते पहुँचते कम से कम एक महीना तो अवश्य लगना चाहिए, परंतु रामायण से व्यक्त होता है कि राम की सुग्रोव से भेंट होने में इससे आधा भी समय नहीं लगा । पुन: वाल्मीकि रामायण ही में नर्मदा नदी का किष्किंधा के दक्षिण में बतलाया है। परंतु ग्रनगुडी से नर्मदा नदी ४०० मील उत्तर में है इन बातों से स्पष्ट लख पड़ेगा कि सुग्रीव का स्थान दूर से दूर बिलासपुर जिले में था ! इस जिले में कदा नाम की एक प्राचीन जमादारी है । संभव है कि यह किष्किंधा का लघु रूप हो। इसके सिवाय अनेक स्थान मिलते जो प्राचीन ऋषि आश्रमों के स्मारक हैं, यथा मातिन जहां आज भी जंगली हाथी मिलते हैं, मतंग ऋषि का आश्रम यहीं ज्ञात होता है । कदाचित् मतंगों की बहुतायत से ही यहाँ के ऋषि का नाम मतंग प्रसिद्ध हो गया हो । इन्हीं स्थलों के आस पास उरांव = बनरांत्र = बानर जाति की बहुलता है जिसके मुखिया सुयांव थे । अनगुडी के आस पास बानर जाति का लेशमात्र का भी पता नहीं है। इस प्रकार चित्रकूट और