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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/७२

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(३) पृथ्वीराज रासो का निर्माण-काल लेखक - महामहोपाध्याय रायबहादुर श्री गौरीशंकर हीराचंद श्रीझा ] उसका पृथ्वीराज रासो राजस्थानीय हिंदी भाषा का वीररसात्मक बृहत् काव्य है। राजपूताने में उसका बड़ा आदर है। पहले वही ग्रंथ इतिहास का खजाना समझा जाता था, परंतु प्राधुनिक विद्वान शोधक उसकी असलियत में संदेह करने लगे हैं। रचयिता चंद बरदाई उक्त ग्रंथ के अनुसार पृथ्वीराज का राजकवि था । यदि वास्तव में वह ग्रंथ पृथ्वीराज के समय में बना होता, तो उसमें लिखी हुई पृथ्वीराज के संबंध की सब घटनाएँ शुद्ध होतीं, परंतु प्राचीन शोध की कसौटी पर उनमें से अधिकांश ठीक नहीं उतरती । राजपूताने के प्रसिद्ध इतिहास-लेखक कर्नल टॉड ने उस ग्रंथ से बहुत सी बातें अपने 'राजस्थान' में उद्धृत की हैं और उसकी कविता पर मुग्ध होकर उसने उसके तीस हजार छंदों का अँगरेजी अनुवाद भी किया था | बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी ने उसे ऐतिहासिक ग्रंथ समझकर उसका कुछ अंश अपनी ग्रंथमाला में प्रकाशित भी किया था । All ई० सन् १८७५ में प्रसिद्ध पुरातत्त्वेत्ता डाक्टर बूलर को कश्मीर में संस्कृत ग्रंथों की खोज करते समय [ जयानक कवि-रचित ] 'पृथ्वीराज - विजय महाकाव्य' की भोजपत्र पर लिखी हुई एक प्राचीन अपूर्ण प्रति मिली, जिस पर द्वितीय राजतरंगिथी के कर्त्ता जोनराज की टीका भी है। इस पुस्तक को पढ़ने के पश्चात् उक्त डाक्टर ने एशियाटिक सोसाइटी बंगाल को निम्नलिखित आशय का पत्र लिखा-

  • मेरा लिखा हुआ कर्नल जेम्स टॉड का जीवनचरित्र, ( खङ्गविलास

प्रेस, बांकीपुर (पटना) से प्रकाशित 'हिंदी टांड राजस्थान' प्रथम खंड में ) ५० ३३ ।