सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/८०

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

रायबहादुर श्री गौरीशंकर हीराचंद प्रोफा ३७ उत्तराधिकारी कुमारपाल ( वि० सं० ११८-१२३० ) से सम्मानित हुआ था, अपने 'द्वनाश्रय महाकाव्य' के ८ वें सर्ग में गुजरात के सोलंकी राजा भीमदेव के दूत और चेदि देश के राजा कर्ण के वार्तालाप का सविस्तर वर्णन किया है । उसका सारांश यह है- wwwww "दूत ने राजा कर्ण से पूछा कि भीम आपसे यह जानना चाहते हैं कि आप उनके मित्र हैं वा शत्रु । इसके उत्तर में कर्ण ने कहा कि कभी निर्मूल न होनेवाला सोम (चंद्र) वंश विजयी है । इसी वंश में जन्म लेकर पुरूरवा ने पृथ्वी का पालन किया । इंद्र के अभाव में डरे हुए स्वर्ग का रक्षण करनेवाला मूर्तिमान् चात्रधर्म नहुप इसी कुल में उत्पन्न हुआ । इसी वंश के राजा भरत ने निरंतर संग्राम करने और अनीति के मार्ग पर चलनेवाले दैत्यों का संहार कर अतुल यश प्राप्त किया । इसी कुल में जन्म लेकर धर्मराज युधिष्ठिर ने उद्धत शत्रुओं का नाश किया । जनमेजय तथा अन्य अक्षय यशवाले तेजस्वी राजा इसी वंश में हुए और इन सब पूर्ववर्ती राजाओं की समानता करनेवाला भीम (भीम देव) इस समय विजयी है । सत्पुरुषों में परस्पर मैत्री होना स्वाभाविक है, अतएव हमारी मैत्री के विरुद्ध कौन क्या कह सकता है" | * ऊपर उद्भुत किए हुए प्रमाणों से निश्चित है कि पृथ्वीराज के समय तथा उससे पूर्व भी सोलंकी अपने को अग्निवंशी नहीं, किंतु चंद्रवंशी और पांडवों की संतान मानते थे । पृथ्वीराज के पिता सोमेश्वर का बड़ा भाई विग्रहराज ( वीसलदेव चतुर्थ ) बड़ा विद्वान राजा था। उसने अजमेर में अपनी बनवाई हुई संस्कृत पाठशाला (सरस्वती मंदिर ) में अपना चौहान वंश की उत्पत्ति बनाया हुआ 'हरकेलि नाटक', अपने राजकवि सोमेश्वररचित 'ललित विग्रहराज' नामक नाटक तथा चौहानों के इतिहास का एक काव्य शिलाओं पर खुदवाएं उस मंदिर को तोड़कर वहाँ पर 'ढाई दिन का मुसलमानों ने पिड़ा' नाम की

  • द्वयाश्रय महाकाव्य; सर्ग ३, श्लोक ४०-२६ (सोलंकियों का प्राचीन

इतिहास: प्रथम भाग, पृष्ठ १ और १० के टिप्पण में प्रकाशित ) ।