पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/१८६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।
१७४
गल्प-समुच्चय


महादेव ने कमर से दो मोहरें निकाली और पुरोहितजी के सामने रख दीं।

पुरोहित की लोलुपता पर टीकायें होने लगी। यह बेईमानी है, बहुत तो दो-चार रुपये का नुकसान हुआ होगा। बेचारे से ५०) ऐंठ लिये। नारायण का भी डर नहीं। बनने को पंडित, पर नीयत ऐसी खराब! राम राम!

लोगों को महादेव से एक श्रद्धा-सी हो गई। एक घंटा बीत गया;पर उन सहस्रों मनुष्यों में से एक भी न खड़ा हुआ। तब महादेव ने फिर कहा-मालूम होता है, आप लोग अपना-अपना हिसाब भूल गये हैं; इसलिये आज कथा होने दीजिये, मैं एक महीने तक आपकी राह देखूँगा। इसके पीछे तीर्थ यात्रा करने चला जाऊँगा। आप सब भाइयों से मेरी विनती है कि आप मेरा उद्धार करें।

एक महीने तक महादेव लेनदारों की राह देखता रहा। रात को चोरों के भय से नींद न आती। अब वह कोई काम न करता। शराब का चसका भी छूटा। साधु-अभ्यागत जो द्वार पर आ जाते, उनका यथायोग्य सत्कार करता। दूर-दूर उसका सुयश फैल गया। यहाँ तक कि महीना पूरा हो गया और एक आदमी भी हिसाब चुकाने न आया। अब महादेव को ज्ञात हुआ कि संसार में कितना धर्म, कितना सद्व्यवहार है। अब उसे मालूम हुआ कि संसार बुरों के लिये बुरा है; पर अच्छों के लिये अच्छा है।

( ६ )

इस घटना को हुए ५० वर्ष बीत चुके हैं। आप बेंदो जाइये, तो