पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/१८९

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कमलावती

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(१)

"रुस्तम !"

"जनाब!"

"क्या यह वही स्थान है?"

"जी हाँ, यह वही गुर्जर-प्रदेश है।"

"रुस्तम! क्या सत्य ही यह गुर्जर-प्रदेश है? क्या हम लोगों ने इसी को ध्वंस करने का विचार किया है? क्या इसी के लिये हमने यह छद्म-वेष रचा है? रुस्तम! सच कहो, क्या यही समुद्र-मेखला, गिरि-किरीटिनी, गुजर-भूमि है?"

हुजूर जो अनुमान करते हैं वह सत्य है। कृष्ण-वर्ण छाया के सदृश सम्मुख जो देख पड़ती है वही गुर्जर की तटभूमि है।"

"रुस्तम, इन पर्वत-श्रेणियों की शोभा तो देखो, कितने ऊँचे हैं! जान पड़ता है कि गगन-नीलिमा को स्पर्श करने के लिये ये गर्व भाव से इतने उन्नत हो गये हैं। कैसा अलौकिक सौन्दर्य है! ऐसा दृश्य हमने अफगानिस्थान में कभी नहीं देखा था। रुस्तम, यह स्वर्ग-भूमि तो नहीं है? इसके मलय-प्रवाह में कैसी संजीविनी शक्ति है! चन्द्र-ज्योत्स्ना कैसी उज्ज्वल और स्निग्ध है।"