पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/२१५

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कमलावती

कुमार—कमला, यह विषाद करने का समय नहीं है। तुम राजपूत-कन्या हो। धैर्य धरो। मैं जाता हूँ; पर एक बात और कहनी है। मुसलमानों का कोई विश्वास नहीं। युद्ध में जय-पराजय दोनों मिलती हैं। कौन जानता हैं, कहीं हमारी पराजय हो और उन लोगों की जय। यदि कहीं ऐसा हो, तब तुम्हें आत्मरक्षा के लिये समय न मिलेगा; इसलिए यह मैं तुम्हें दिये जाता हूँ। विपद् पड़ने पर अपनी धर्म-रक्षा के लिए तुम इस विष का सदुपयोग करना। मेरी मृत्यु हो जाने और तुम्हारे पिता के स्वर्ग-गत होने पर, कमला! तुम यह जान रक्खो, देवता भी तुम्हारी रक्षा न कर सकेंगे। उस समय यही विष तुम्हारी और तुम्हारे धर्म की रक्षा करेगा। जब तुम सुन लेना कि कुमार अब संसार में नहीं रहा, तब तुम विष-पान कर अपनी पवित्र आत्मा की रक्षा करना।

यह कहकर कुमार ने कमलावती के हाथ में एक काग़ज़ की पुड़िया दे दी और फिर सजल नेत्रों से युद्ध-भूमी की ओर प्रस्थान किया। भैरव दूसरे कमरे में था। कुमार को जाते देखकर वह भी उनके पीछे हो गया।

(८)

सन्ध्या हुई। गुर्ज्जर-सेना पठानों से पराजित हुई। सूर्यदेव गुर्ज्जर के पराजय का कलङ्क न सह क्रोध में लोहित वर्ण धारणकर आकाश-मण्डल में अदृश्य होगये।

उस दिन भगवान सोमनाथ के मन्दिर में आरती नहीं हुई। उस दिन देव-मन्दिर के घण्ट-निनाद और ब्राह्मणों के स्तोत्र-पाठ से