पृष्ठ:ग़बन.pdf/१८५

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देवीदीन ने सिटपिटाकर कहा——क्या करोगी पूछकर, एक अखबार के दफ्तर में तो गया था। जो चाहे कर ले।

बुढ़िया ने माथा ठोंककर कहा——तुमने फिर वही लत पकड़ी? तुमने कान पकड़ा था कि अब कभी अखबारों के नगीच न जाऊँगा। बोलो, यही मुँह था कि कोई और ?

'तू बात तो समझती नहीं, बस बिगड़ने लगती है।'

'खूब समझती हूँ। अखबार वाले दंगा मचाते हैं और गरीबों को जेहल ले जाते हैं । आज बीस साल से देख रही हूँ । वहाँ जो आता-जाता है, पकड़ लिया जाता है । तलासी तो आये-दिन हुआ करती है । क्या बुढ़ापे में जेहल की रोटियां तोड़ोगे?'

देवीदीन ने एक लिफ़ाफ़ा रमानाथ को देकर कहा यह रुपये हैं, भैया, गिन लो। देख, यह रुपये वसूल करने गया था । जी न मानता हो, तो, आधे ले लो । बुढ़िया ने आँख फाड़कर कहा—— अच्छा ! तो तुम अपने साथ इस बेचारे को भी डुबाना चाहते हो ? तुम्हारे रुपये में आग लगा दूँगी । तुम रुपये मत लेना भैया । जान से हाथ धोओगे । अब सेतमेत आदमी नहीं मिलते, तो लालच दिखाकर लोगों को फँसाते हैं । बाजार में पहरा दिलबावेंगे, अदालत में गवाही करावेंगे। फेंकदो उसके रुपये। जितने रुपये चाहो, मुझसे ले जाओ।


जब रमानाथ ने सारा वृत्तान्त कहा तो बुढ़िया का चित्त शांत हुआ। तनी हुई भवें ढीली पड़ गयी, कठोर मुद्रा नर्म हो गयी। मेघ-पट को हटाकर नीला आकाश हँस पड़ा । विनोद करके बोली—इसमें से मेरे लिए क्या लाओगे बेटा?

रमा ने लिफ़ाफ़ा उसके सामने रखकर कहा——तुम्हारे तो सभी हैं अम्मा, मैं रुपये लेकर क्या करूँगा?

'घर क्यों नहीं भेज देते ? इतने दिन आये हो गये, कुछ भेजा नहीं।'

'मेरा घर यही है, अम्मा। कोई दूसरा घर नहीं है।'

बुढ़िया का वंचित हृदय गद्गद हो उठा । इस मातृ-भक्ति के लिए कितने दिनों से उसकी आत्मा तड़प रही थी । इस कृपण हृदय में जितना प्रेम संचित हो रहा था, वह सब माता के स्तन में एकत्र होने वाले दूध की भांति निकलने के लिए आतुर हो गया।

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