पृष्ठ:ग़बन.pdf/१९३

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वकील साहब ने आग्रह कहा——आज चली जाओ। आज क्या, शाम को रोज घण्टो-भर के लिए निकल जाया करो ।

रतन ने चिन्तित होकर कहा——लेकिन चिन्ता तो लगी रहेगी।

वकोल साहब ने मुसकराकर कहा——मेरी? मैं तो अच्छा हो रहा है।

रतन ने सन्दिग्ध भाव से कहा——अच्छा, चली जाऊँगी।

रतन को कल से वकील साहब के आश्वासन पर कुछ संदेह होने लगा था। उनकी चेष्टा से अच्छे होने का कोई लक्षण उसे न दिखायी देता था। इनका चेहरा क्यों दिन-दिन पीला पड़ता जाता है ? इनकी आँखें क्यों हरदम बन्द रहती हैं ? देह क्यों दिन-दिन धुलती जाती है ? महाराज और कहार से वह यह शंका न कह सकती थी। कविराजजी से पूछते उसे संकोच होता था । अगर कहीं रमा मिल जाते, तो उनसे पूछती। वह इतने दिनों से यहाँ हैं किसी दूसरे डाक्टर को दिखाती। इन कविराजजी से उसे कुछकुछ निराशा हो चली थी।

जब रतन चले गयी तो वकील साहब ने टीमल से कहा——मुझे जरा उठा बिठा दो टीमल पडे-पड़े कमर सीधी हो गयी । एक प्याला चाय पिला दो। कई दिन हो गये चाय की सुरत नहीं देखी। यह पथ्य मुझे मारे डालता है । दूध देखकर ज्वर चढ़ आता है; पर उनकी खातिर से पी लेता है। मुझे तो इस कविराज की दवा से कोई फायदा नहीं मालूम होता । तुम्हें क्या मालूम होता है ?

टीमल ने वकील साहब को तकिये के सहारे बैठाकर कहा——बाबूजी, सो देख लेव, यह तो मैं पहले ही कहने वाला था। सो देख लेव, बहूजी के डर के मारे नहीं कहता था।

वकील साहब ने कई मिनट चुप रहने के बाद कहा——मैं मौत से डरता नहीं, टीमल । बिल्कुल नहीं। मुझे स्वर्ग और नरक पर बिल्कुल विश्वास नहीं है। अगर संस्कारों के अनुसार आदमी को जन्म लेना पड़ता है तो मुझे विश्वास है, मेरा जन्म किसी अच्छे घर में होगा। फिर भी मरने को जी नहीं चाहता । सोचता हूँ, मर गया तो क्या होगा।

टीमल ने कहा——बाबूजी, सो देख लेव,आप ऐसी बातें न करें। भगवान चाहेंगे, तो अच्छे हो जायेंगे। किसी दूसरे डाक्टर को बुला लाऊँ ? आप

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