पृष्ठ:ग़बन.pdf/१९७

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रतन ने उसकी ओर कठोर नेत्रों से देखा । वह बिना जवाब की अपेक्षा किये चुपके से चला गया।

मगर एक ही क्षण में रतन को महाराज पर दया आ गयी । उसने कौन-सी बुराई की, जो भोजन के लिए पूछने आया ? भोजन भी ऐसी चीज है, जिसे कोई छोड़ सके ? वह रसोई में जाकर महाराज से बोलो——तुम लोग खा लो, महाराज ! मुझे आज भूख नहीं लगी है।

महाराज ने आग्रह किया— दो ही फुलके खा लीजिए सरकार ।

रतन ठिठक गयी ! महाराज के आग्रह में इतनी सहृदयता, इतनी समबेदना भरी हुई थी कि रतन को एक प्रकार की सांत्वना का अनुभव हुआ । यहाँ कोई अपना नहीं है, यह सोचने में उसे अपनी भूल प्रतीत हुई । महाराज ने अब तक रतन को कठोर स्वामिनी के रूप में देखा था । वही स्थामिनी आज उसके सामने खड़ी, मानो सहानुभूति की भिक्षा मांग रही थी। उसकी सारी सवृत्तियाँ उमड़ उठी । रतन को उसके दुर्बल मुख' पर अनुराग का तेज नजर आया।

उसने पूछा——क्यों महाराज, बाबूजी को इस कविराज की दवा से कोई लाभ हो रहा है ?

महाराज ने डरते-डरते वही शब्द दुहरा दिये जो वकील साहब से कहे थे——कुछ-कुछ तो हो रहा है, लेकिन जितना होना चाहिए उतना नहीं ।

रतन ने अविश्वास के अन्दाज से देखकर कहा-तुम भी मुझे धोखा देते हो महाराज?——महाराज की आँखें डबडबा गयी । बोले-भगवान् सब अच्छा ही करेंगे बहुजी, घबराने से क्या होगा ! अपना तो कोई बस नहीं है।

रतन ने पूछा——यहाँ कोई ज्योतिषी न मिलेगा? जरा उनसे पूछते । कुछ पाठ-पूजा भी करा लेने से अच्छा होता है।

महाराज ने तुष्टि के भाव से कहा——यह तो मैं पहले कहने वाला था, बहुजी, लेकिन बाबूजी का मिजाज तो जानती हो । इन बातों से वह कितना बिगड़ते हैं!

रतन ने दृढ़ता से कहा——सबेरे किसी को ज़रूर बुला लाना। 'सरकार चिढ़ेंगे।'

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