पृष्ठ:ग़बन.pdf/२५१

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लगा। रमा चौंक पड़ा। यह जालपा है! वेशक जालपा है! मगर, नहीं-नहीं जालपा यहाँ कैसे आयेगी? मेरा पता-ठिकाना उसे कहाँ मालूम! बुड्ढे मने उसे खत तो नहीं लिख दिया? जालपा ही है? नायव दारोगा मोटर चला रहा था। रमा ने बड़ी मिन्नत के साथ कहा-सरदार साहब,एक मिनट के लिए रुक जाइए! मैं जरा देवीदीन से एक बात कर लूं। नायब ने मोटर जरा धीमी कर दी लेकिन फिर कुछ सोचकर उसे आगे बढ़ा दिया।

रमा ने तेज होकर कहा-आप तो मुझे कैदी बनाये हुए हैं! नायब ने खिसियांकर कहा-आप तो जानते है, डिप्टी साहब कितने जल्द जामे से बाहर हो जाते हैं।

बंगले पर पहुँचकर रमा सोचने लगा,जालपा से कैसे मिलें। वहीं जालपा ही थी,इसमें अन उसे कोई शुबहा न था! आँखों को कैसे धोखा देता। हृदय में एक ज्वाला-सी उटी हुई थी,क्या करूँ? कैसे जाऊँ? उसे कपड़े उतारने की सुधि भी न रही। पन्द्रह मिनट तक वह कमरे के द्वार पर खड़ा रहा। कोई हिकमत न सूझी। लाचार पलंग पर लेट रहा।

जरा ही देर में वह फिर उठा और सामने सहन में निकल आया। सड़क पर उसी वक्त बिजली की रोशनी ही गयी। फाटक पर चौकीदार खड़ा था। रमा को उस पर इस समय इतना क्रोध आया कि गोली मार दे। अगर मुझे कोई अच्छी जगह मिल गयी, तो एक-एक से समझूगा। तुम्हें तो डिसमिस कराके छोडूँगा। कैसे शैतान की तरह सिर पर सवार है। मुंह तो देखो जरा! मालूम होता है,बकरी की दुम है! वाह रे आपकी पगड़ी। गोया योझ ढोनेवाला कुली है!अभी कुत्ता भूँक पड़े, तो आप दुम दबा कर भागेंगे;मगर यहाँ ऐसे डटे खड़े हैं,मानों किसी किले के द्वार की रक्षा कर रहे हैं!

एक चौकीदार ने आकर कहा--इसपिट्टर साहब ने बुलाया है। कुछ नये तवे मंगवाये हैं।

रमा ने झल्लाकर कहा-मुझे इस वक्त फूरसत नहीं है।

फिर सोचने लगा। जालपा यहाँ कैसे आयी? अकेले ही आयी है, या कोई साथ है? जालिम ने बुड्ढे से एक मिनट भी बात न करने दिया।जालपा पूछेगी तो जरूर,कि क्यों भागे थे? साफ़-साफ कह दूंगा,उस समय और कर ही क्या सकता था,पर इन थोड़े दिनों के कष्ट ने जीवन का प्रश्न तो

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