पृष्ठ:ग़बन.pdf/२५२

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हल कर दिया। अब आनन्द से जिन्दगी कटेगी। कोशिश करके उसी तरफ अपना तबादला करवा लूंगा। यह सोचते-सोचते रमा को खयाल आया,कि जालपा भी यहाँ मेरे साथ रहे,तो क्या हरज है।बाहरवालों से मिलने की रोक-टोक है। जालपा के लिए क्या रुकावट हो सकती है? लेकिन इस वक्त इस प्रश्न का छेड़ना उचित नहीं। कल इसे तय करूँगा। देवीदीन भी विचित्र जीव है। पहले तो कई बार आया;पर आज उसने भी सन्नाटा खींच लिया। कम-से-कम इतना तो हो ही सकता था,कि आकर पहरेवाले कांसटेबल से जालपा के आने की खबर मुझे देता। फिर मैं देखता कि कौन जालपा को नहीं आने देता।पहले इस तरह की कैद जरूरी थी;पर अब तो मेरी परीक्षा पूरी हो चुकी। शायद सब लोग खुशी से राजी हो जायेंगे।

रसोइया थाली लाया। मांस एक तरह का था। रमा थाली देखते ही झल्ला गया। इन दिनों रुचिकर भोजन देखकर ही उसे भूख लगती थी। जब तक चार-पाँच प्रकार का मांस न हो,चटनी-अचार न हो,उसको तृप्ति न होती थी।

बिगड़कर बोला-क्या खाऊँ? तुम्हारा सिर? थाली उठा ले जाओ।

रसोइये ने डरते-डरते कहा-हुजूर,इतनी जल्द और चीजें कैसे बनाता! अभी कुल दो घण्टे आये हुए हैं 'दो घण्टे तुम्हारे लिए थोड़े होते हैं?' 'अब हुजूर से क्या कहूँ।' 'मत बको! डैंम! 'हुजूर..... 'मत बको! डैंम! रसोइये ने फिर कुछ न कहा। बोतल लाया,बर्फ तोड़कर ग्लास में डाली और पीछे हटकर खड़ा हो गया।

रमा को इतना क्रोध आ रहा था,कि रसोइये को नोच खाये। उसका मिजाज इन दिनों बहुत तेज हो गया था।

शराब का दौर शुरू हुआ,तो रमा का गुस्सा और भी तेज हुआ। लाल लाल आँखों से उसे देखकर बोला-चाहूँ तो अभु तुम्हारा कान पकड़कर निकाल दूँ।अभी,इसी दम। तुमने समझा क्या है!

ग़बन
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