पृष्ठ:ग़बन.pdf/२५४

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मिल ही चुका, अब उसके फल से क्यो हाथ धोऊँ ? मगर इन सबी ने मुझे कैसा चकमा दिया है ! और अभी तक मुबालते में डाले हुए हैं । सब-के-सव मेरी दोस्ती का दम भरते हैं, मगर अभी तक असली बात मुझसे छिपाये हुए हैं। अभी इन्हें मुझ पर विश्वास नहीं ! अभी इसी बात पर अपना बयान बदल हूँ, तो आटे-दाल का भाव मालूम हो । यही न होगा, मुझे कोई जगह न मिलेंगी, बला से; इन लोगों के मनसूबे तो खाक में मिल जायेंगे । इस दगाबाजी को सजा तो मिल जायगी । और यह कुछ न सही, इतनी बड़ी वदनामी से तो बच जाऊँगा । यह सब शरारत जरूर करेंगे; लेकिन झूठा इलजाम लगाने के सिवा और कर ही नया सकते हैं। जब मेरा यहाँ रहना साबित ही नहीं, तो मुझ पर दोष ही क्या लग सकता है । सबों के मुंह में कालिख लग जायगी । मुंह तो दिखाया न जायगा, मुकदमा क्या चला देंगे।

मगर नहीं । इन्होंने मुझसे चाल चली हैं, तो मैं भी इनसे वही चाल चलूँगा। कह दूँगा, अगर मुझे आजज कोई अच्छी जगह मिल जायेगी, तो मैं शहादत दूँगा, वरना साफ कह दूँगा, इस मामले से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं। नहीं तो पीछे से किसी छोटे-मोटे थाने में नायब दारोगा बनाकर भेज दें और यहाँ सड़ा करूं । लूँगा इंसपेक्टरी और कल दस बजे मेरे पास नियुक्ति का परवाना आ जाना चाहिए। वह चला कि इसी वक्त दारोगा से कह दूँ, लेकिन फिर रुक गया। एक बार जालपा से मिलने के लिए उसके प्राण तड़प रहे थे। उसके प्रति इतना अनुराग, इतनी श्रद्धा उसे न हुई थी, मानो वह कोई दैवी शक्ति हो जिसे देवताओं ने उसकी रक्षा के लिए भेजा हो।


दस बज गये थे। रमानाथ ने बिजली गुल कर दी और बरामदे में आकर जोर से किवाड़ बन्द कर दिये, जिसमें पहरेवाले सिपाही को मालूम हो अन्दर से किवाड़ बन्द करके सो रहे हैं। वह अँधेरे बरामदे में एक मिनट खड़ा रहा । तब आहिस्ता ने उतरा और काँटेदार फेंसिंग के पास आकर सोचने लगा,उस पार कैसे जाऊँ? शायद अभी जालपा बगीचे में हो । देवीदीन ज़रूर उसके साथ होगा। केवल यही तार उसकी राह रोके हुए था। उसे फाँद जाना असम्भव था। उसने तारों के बीच से होकर निकल जाने का निश्चय किया । अपने सब कपड़े समेट लिए और काँटे को बचाते हुए सिर और कंधे को तार के बीच में डाला; पर न जाने कैसे कपड़े फंस गये ।

ग़बन
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