पृष्ठ:ग़बन.pdf/२५५

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उसने हाथ से कपड़ों को छुड़ाना चाहा तो आस्तीन काँटों में फंस गयी । धोती भी उलझी हुई थी। बेचारा बड़े संकट में पड़ा। न इस पार जा सकता था; न उस पार । जरा भी असावधानी हुई और काँटे उसको देह में चुभ जायेंगे।

मगर इस वक्त उसे कपड़ों की परवा न थी। उसने गर्दन और आगे बढ़ाई और कपड़ों में लम्बा चीरा लगाता हुआ उस पार निकल गया। सारे कपड़े तार-तार हो गये, पीठ में कुछ खरोंचें लगी; इस समय कोई बन्दुक का निशाना बांधकर भी उसके सामने खड़ा हो जाता तो भी वह पीछे न हटता ! फटे हुए कुरते को उसने वहीं फेंक दिया । गले की चादर फट जाने पर भी काम दे सकती थी, उसे उसने मोढ़ लिया, धोती समेट ली और बगीचे में धूमने लगा । सन्नाटा था । शायद रखवाला खटिक खाना खाने गया हुआ था। उसने दो-तीन बार धीरे-धीरे जालपा का नाम लेकर पुकारा भी। किसी की आहट न मिली; पर एक निराशा होने पर भी मोह ने उसका गला न छोड़ा । उसने एक पेड़ के नीचे जाकर देखा । समझ गया, जालपा चली गयी । वह उन्हीं पैरों देवीदीन के घर की ओर चला। उसे जरा भी शोक न था। बला से किसी को मालूम हो जाय कि मैं बँगले से निकल आया हूँ। पुलिस मेरा कर ही क्या सकती हैं। मैं कैदी नहीं हूँ, गुलामी नहीं लिखायी है।

आधी रात हो गयी थी । देवीदीन भी आध घण्टे पहले लौटा था और खाना खाने जा रहा था, कि एक नंगे-बड़गे आदमी को देखकर चौंक पड़ा। रमा ने सिर पर चादर बांध ली थी और देवीदीन को डराना चाहता था।

देवीदीन ने सशंक होकर कहा-कौन है ?

मगर फिर सहसा पहचान गया और झपटकर उसका हाथ पकड़ता हुआ बोला——तुमने तो भैया, खूब भेस बनाया है। कपड़े क्या हुए?

रमा०——तार से निकल रहा था, सब उसके काँठे में उलझकर फट गये।

देवी०——राम-राम ! देह में तो काँटे नहीं चुभे ?

रमा०——कुछ नहीं, दो एक खरोंचें लग गयीं। मैं बहुत बचाकर निकला।

देवी०——बहू की चिट्ठी मिल गयी न ?

रमा०——हाँ, उसी वक्त मिल गयी । क्या तुम्हारे साथ थीं ?

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