पृष्ठ:ग़बन.pdf/२५६

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देवी०——वह मेरे साथ नहीं थी, मैं उनके साथ था। जब मैं तुम्हे मोटर पर आते देखा, तभी से जाने-जाने लगाये हुए थीं।

रमा——तुमने कोई खत लिखा था ?

देवी——हमने कोई खत-पत्तर नहीं लिखा भैया । जब वह आयी तो मुझे आप ही अचम्भा हुआ, कि बिना जाने-बूझे कैसे आ गयी। पीछे से उन्होंने बताया । वह सत्तरंजवाला नक्शा उन्होंने पराग से भेजा था और इनाम भी वहीं से आया था।

रमा की आँखें फैल गयीं । जालपा की चतुराई ने उसे विस्मय में डाल दिया। इसके साथ ही पराजय के भाव ने उसे कुछ खिन्न कर दिया, वहाँ भी इस बुरी तरह उसको हार हुई।

बुढ़िया ऊपर गयी हुई थी । देवीदीन ने जीने के पास जाकर कहा——अरे क्या करती है ? बहु से कह दे, एक आदमी उनसे मिलने आया है।

यह कहकर देवीदीन ने फिर रमा का हाथ पकड़ लिया और बोला—— चलो, अब सरकार में तुम्हारी पेसी होगी । बहुत भागे थे। बिना वारंट के पकड़ गये । इतनी आसानी से पुलिस भी न पकड़ सकती।

रमा का मनोल्लास द्रवित हो गया था। लज्जा से गड़ा जाता था । जालपा के प्रश्नों का उसके पास क्या जवाब था । जिससे वह भागा था, उसने अन्त में उसका पीछा करके परास्त हो कर दिया। वह जालपा के सामने सीधी आँखें भी तो न कर सकता था। उसने हाथ छुड़ा लिया और जीने के पास ठिठक गया। देवीदीन ने पूछा—— क्यों रुक गये ?

रमा ने सिर खुजलाते हुए कहा——चलो, मैं आता हूँ।

बुढ़िया ने ऊपर ही से कहा——पूछो कौन इदमी है, कहाँ से आया है ?

देवीदीन ने बिनोद किया——कहता है, मैं जो कुछ कहूँगा बहू ले ही कहूँगा! 'कोई चिट्ठी लाया है ?

'नहीं!'

सन्नाटा हो गया । देवीदीन ने एक क्षण के बाद पूछा——कह दूँँ लौट जाय?

जालपा जीने पर आकर बोली——कौन इदमी है, पूछती तो हूँ ! 'कहता है, बड़ी दूर से आया हूँ।'

ग़बन
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